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मथुरा-वृन्दावन का चुनाव था या कुछ और था?

ByVijay Singhal

May 5, 2023
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल

मथुरा उत्तर प्रदेश 5 मई 2023 स्थानीय निकाय चुनाव का मतदान होते ही चुनाव में दिलचस्पी ले रहे लोगों से उनके मिलने-जुलने वालों, निकट संबंधियों ने कहा, चलो हो गया चुनाव। चलो अब अपने काम पर लगो। दाढ़ी बनवाओ, बाल कटवाओ। समय से स्नान करो, ध्यान करो। सब काम करो। धंधा धेले का नहीं और फुर्सत पल भर की नहीं है। चुनाव में दिलचस्पी कुछ ऐसी होती है कि जिसके बारे में कहने वाले ने कहा है कि राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है, इस मंडी में सभी ने मदिरा पी ली है। जब मदिरा पियोगे तो वह चढ़ेगी भी, चढ़ेगी तो और सब सब कुछ भूलोगे भी। लेकिन यह चुनाव की शराब है साहब, अभी इसका नशा कहां उतरना है, अभी तो इसे पी-पी कर 13 मई का इंतजार करना है। जिनके लिए मंगाई थी, उन्हें पहुंच पाई थी कि नहीं पहुंच पाई थी क्योंकि चुनाव में वोट देने तो वह आए नहीं थे। किस चुनाव की बात करते हो तुम, यह कोई चुनाव था? क्या इसको ही चुनाव कहते हैं, जिसमें वोटर गाड़ियों में बैठा-बैठा कर लाए जाते हैं, जो गाड़ियों में बैठा कर लाए जाते हैं, वह वोटर नहीं होते हैं, सिर्फ और सिर्फ सपोर्टर होते हैं। उनका भी कोई भरोसा नहीं कि अंदर जाकर क्या कर आएं? यह अंदर की बात है, अंदर क्या हो, और फिर मतदाता के खुद के अंदर क्या है, यह कौन जान पाया है। अंदर वह आपके प्रतिद्वंदी को वोट दे आए और बाहर आकर आपका गान गाए। इसीलिए भी तो अंदर भी अपने लोग जाते हैं सेट करवाए। यह चुनाव नहीं है साहब, किसी कीमत पर चुनाव नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए खतरे की बड़ी घंटी है, जिसमें से लोक गायब हो गया है, सिर्फ तंत्र रह गया है। यह चुनाव है। समझ में आया कुछ? यही तो मथुरा-वृन्दावन नगर निगम का चुनाव कह गया है, जिसमें हुई है सिर्फ 38.52% वोटिंग। यानी कि 100 में से सिर्फ साढ़े 38 लोगों ने इस चुनाव में हिस्सा लिया और उनमें भी कौन रहे होंगे, आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं? इससे ज्यादा तो चुनाव लड़ने वालों के नाते-रिश्तेदार रहे होंगे, तो क्या वह भी पूरे वोट डालने नहीं आए? जेहन में सेंटेंस आता है यह कोई चुनाव है, जनता में फैलाया जाने वाला बेवजह का तनाव है। ऐसे ही हालात रहे तो कभी सुप्रीम कोर्ट के हॉनरेबल चीफ जस्टिस सर श्री डीवाई चंद्रचूड़ को यह न कहना पड़े कि अगर यही चुनाव है तो ऐसा चुनाव न कराया जाना बेहतर है। सत्ता लोलुप पूछ सकते हैं, अगर यह चुनाव नहीं है तो और क्या है? मुर्गी की जान गई और मियां को मजा ही नहीं आया। हमसे पूछो कितने महीनों से लगे हुए थे? कब से, कितने लोगों को रखा रहे थे, खिला रहे थे, पिला रहे थे, नहलवा रहे थे, धुलवा रहे थे, सुलवा रहे थे, जगवा रहे थे? और क्या-क्या नहीं कर करवा रहे थे? मशीनरी से पूछिए कितनी हलकान थी और अभी तक है। पंचामृत तो बंट जाता है गिने-चुने पंचों में, शेष सभी तो पंजीरी फांकते रह जाते हैं, बहुतों को तो वह भी नहीं मिल पाती है। नींद उड़ जाती है बीपी बढ़ जाता है और किसी की तो जान ही चली जाती है। देखा नहीं अपने ही आगरा मंडल के मैनपुरी में एक एसडीएम की चुनाव ड्यूटी के दौरान जान चली गई। बेचारे प्रत्याशी, मतदाता के लिए क्या नहीं कर रहे थे? सब की दीवारों पर अपने पोस्टर लगवा रहे थे, ढोल बजाते हुए उनसे मिलने जा रहे थे, हाथ जोड़, पैर छू, उनसे अपने पक्ष में मतदान की अपील कर रहे थे और क्या करते? जो पीने वाले थे, उन्हें पिलवा रहे थे। जो लेने वाले थे, उन्हें दिलवा रहे थे। जो काम, नहीं करने के थे, वह भी करवा रहे थे। बताइए और क्या करते मतदाता के लिए, क्या उसके तलवे चाटते एक वोट के लिए?आपने तो कह दिया यह कोई चुनाव है? अरे उसके दिल से पूछो, जिसने ढाई-ढाई महीने प्रतिदिन ढाई-ढाई सौ लोगों को मेहमानों की तरह से रखाया हो। आपने तो बड़े झट से कह दिया कि यह कोई चुनाव है? अंदर से सांत्वना का स्वर आता है, नहीं बाबू, यह चुनाव नहीं है। यह आपकी महत्वाकांक्षा का फुलाव है। जब आप में इतना बूता ही नहीं कि आप इतना सब कुछ करने के बावजूद अपने वोटर का वोट नहीं हासिल कर सकते तो यह आपका सिर्फ दिखाव था, उसे भी आपका मतदाता देखने तक नहीं आया। समझते फिरो आप अपने आप को तुम्मन खां, जनता जनार्दन ने आपको कुछ नहीं समझा। सिरे से खारिज कर के रख दिया है आप का चुनाव। फिर भी आप चाहो तो करा लो वोटों की गिनती। लेकिन ध्यान रहे, अब ना होने पाए एक भी गलती। चाहे तो निर्वाचन आयोग भी गौर फरमा ले और दूर करा दे समय रहते सारी विसंगतियां अन्यथा जो अभी 38.52% हुआ है, अगले चुनाव में वह भी नहीं होगा। एक ग्रहणी तो अपने पति की मानती नहीं है। जब पति कहता है कि चलो वोट डाल आएं तो कहती है, मुझे नहीं जाना डालने वोट, सफाई करने तो आते नहीं हैं। जेहन में आता है बात तो सही है, निकाय प्रतिनिधि चुने इन्हीं मूलभूत सुविधाओं के लिए जाते हैं। लेकिन क्या नागरिक ठीक प्रकार से इन सुविधाओं को पाते हैं। देखिए जरा कूड़ा लेने वाली गाड़ी अब चुनाव के कितने दिनों बाद आती है, जो यह गाना गाती है कूड़ा घर के बाहर ले अइयो, आई नगर निगम की गाड़ी? उस गाड़ी वाले आपके लोग भी साहब, मकान और दुकान वालों से महीना अलग से ले जाते हैं। फिर आप हाउस टैक्स और वाटर टैक्स किसका लगाते हैं? ब्रज भाषा में तो बहुत बुरा-बुरा बड़े मजे ले कर कह दिया जाता है। कहने वाले कह देते हैं, बंद करो मतदान, तुम्हारी यह करूं, वह करूं। ऐसा ही कुछ यह चुनाव भी कुछ कह गया है, कह गया है या कि खुद भी बहुत कुछ सह गया है। देखा नहीं आपने सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा। मतदाता का नहीं था कुछ अता-पता? जब मतदान केन्द्र ही सहमे-सहमे नजर आ रहे थे तो मत कक्षों की हालत क्या रही होगी? विपक्ष बाहर खड़ा होकर कहता रहा कि उसे अंदर नहीं जाने दिया जा रहा है जबकि सत्तारूढ़ पार्टी के प्रत्याशी से जुड़े लोग खूब अंदर आ-जा रहे हैं? अंदर उनका जो अभिकर्ता है, उस पर अलग दबाव है। क्या यही चुनाव होता है, क्या यही चुनाव था। अगर यही चुनाव था तो फिर से कराया क्यों? सीधे फरमान क्यों नहीं सुना दिया? फलां पार्षद और फलां मेयर नियुक्त किए जाते हैं। बताया यह भी गया कि इस बार सूचना विभाग ने मतदान के दिन के यह कहकर मीडिया पास ही बनाए कि अंदर तो जाना ही नहीं है और बाहर के लिए किसकी मनाही है? इस बार सिर्फ मतगणना के पास बनेंगे। पहले तो ऐसा नहीं होता था। पहले मतदान और मतगणना के एक ही पास बनते थे। जो मतदान के दिन का पास होता था, वही मतगणना के दिन काम आता था। लेकिन अब नई रीत चली है। इसे भी समझना होगा कि यह क्यों चली है? मतगणना के भी पास भैया क्यों बनाते हो, अंदर तो वहां भी किसी को काउंटिंग पंडाल में नहीं जाना है, सब कुछ मीडिया सेंटर पर ही जब आना है तो व्हाट्सएप ग्रुप ही काफी है, उसी पर डलवा देना। छप जाएगा समाचार। काहे मतगणना के भी मीडिया के पास बनाते हो, क्यों बद्जुबानों को अपने पास बुलाते हो? किसी ने कुछ कह सुन दिया और मुसीबत। इनका कोई भरोसा है। पारदर्शिता को लेकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने लग गए तो बैठे-बिठाए नेशनल खबर बन जाएगी। इसलिए आप भी वही मजिस्ट्रेट बन जाओ, जो यह कहते हैं सब ठीक है, सब ठीक चल रहा है।
सच कह रहा हूं, दिमाग की बत्ती बुझा कर रख दी है इस चुनाव ने। यह मैं नहीं कह रहा हूं, कहीं तुम समझो कि मैं कह रहा हूं। और यह “तुम” और “तू” पर भी मत जाना क्योंकि “तू” में जो “बू” है प्यार की, वह तुम में नहीं और “आप” में तो लियाकत बिल्कुल भी नहीं। यह सब बंसी वारा कह रहा है और एक पुरानी फिल्म का गीत और याद दिला रहा है। ये तख्तों ये ताजों की दुनिया, यह इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया, यह दुनिया है या आलम-ए-बदहवा सी, यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है? पूरा जरूर सुन लेना, उसमें कहीं यह लाइन भी है कि यहां जिंदगी से है मौत सस्ती। देखा नहीं आपने। चुनाव से चंद रोज पूर्व क्या हुआ? देखना क्या चुनाव के बाद वह सब होता है? यह पब्लिक है बाबू, सब जानती है। अंदर क्या है, बाहर क्या है? यह सब कुछ पहचानती है। बस आप इसे नहीं पहचानते हो, जब चुन जाते हो, भूल जाते हो कि इस पब्लिक ने आपको अपनी सुविधाओं के लिए चुना था, और आप चुनते ही अपने आप को किसी राजा-महाराजा से कम नहीं समझने लगते हो। ऐसे में एक शेर याद आता है-
बड़े कमज़र्फ हैं यह हवा के गुब्बारे, चंद सांसों में फूल जाते हैं,
पाकर जरा सी बुलंदी, अपनी औकात भूल जाते हैं।
सत्ता पक्ष पूछ सकता है, 38 परसेंट क्या चुनाव नहीं होता? 33 परसेंट मार्क्स लाने वाला परीक्षार्थी पास होता है। लेकिन साहब यह चुंगी वाले सरकारी स्कूलों का नहीं, कॉन्वेंट स्कूलों का जमाना है, जिसमें छोटे से छोटे बच्चे से हंड्रेड परसेंट की अपेक्षा की जाती है। चलो आप कान्वेंट स्कूलों को छोड़ो। आप हाईस्कूल और इंटर के आवेदनों को ही बस यहां जोड़ो, क्या उनके परीक्षार्थी भी कभी इतने बड़े प्रतिशत में परीक्षाओं में एब्सेंट रहते हैं? नहीं, नहीं! यह चुनाव नहीं! किसी कीमत पर नहीं!! यह चुनाव का खुला बहिष्कार है, बताइए आपको स्वीकार है? आप यह मत कहिएगा कि गर्मी के दिन थे। कोई गर्मी नहीं थी, गर्मी तो हमारे सूबे के मुखिया अच्छे से ठंडी करना जानते हैं, जिसका संकेत हमारे देश के मुखिया क्लाइमेट चेंज का जिक्र कर पहले ही दे देते हैं। करवा दी गर्मी ठंडी? धूर हुई गर्मी ठंडी! चुनाव से तीन रोज पूर्व आई बारिश ने आपकी पिछले नगर निगम की कार्य-व्यवस्था की सारी पोल और जैसे थाली में सजाकर आपके सामने परोस दी? आपने देखा और नजरअंदाज कर गए। अपने तमाम आईटी सेल लगा दिए, तमाम शिक्षण संस्थान राजनीति के अड्डे बना दिए। इसके बावजूद वोटिंग मात्र 38%? अरे शर्म करो, कुछ तो अच्छे कर्म करो। अच्छा करने के लिए चुने जाते हो, अच्छा तो करते नजर आते नहीं हो। अच्छा नहीं कर सकते हो तो कम से कम बुरा भी मत होने दो। देखो तुम्हारी राजनीति के चक्कर में तुम्हारे ही लोगों के साथ कितना बुरा हुआ है? तुम्हारे ही नाम को लेकर कितना बुरा किया गया है, क्या तुम्हें पता है? चुनाव से पूर्व की कत्ल की रात तुम्हारे समर्थकों पर कैसी बीती? जैसी सुनी है, वैसी और किसी पर ना बीते क्योंकि तुम्हारे ही लोगों पर जुल्म करने वाले तुम्हारे ही नाम ले रहे थे। कह रहे थे कि बुलाओ, अब कहां हैं वह दोनों? यही लोकतंत्र है? ऐसा तो मथुरा में कभी कंस के शासनकाल में भी नहीं हुआ होगा कि उसके लोगों को उसका ही नाम लेकर किसी ने बेरहमी से पीटा हो। नगर में यह चर्चा बड़े जोरों पर है कि चौबिया पाड़ा में दबंगों ने सत्तारूढ़ दल से जुड़े 4 लोगों को पकड़ा और उनसे तुम्हारा नाम लेकर बोले, बुलाओ अपने दोनों राष्ट्रीय और प्रदेशीय नेताओं को। उन्होंने आप दोनों का नाम लेकर कहा, बुलाओ उन दोनों को। बताया जा रहा है कि वह आपका नाम लेते रहे और जुल्म करते रहे। यही आपका सुशासन है? अगर यही सुशासन है तो फिर कुशासन किसे कहते हैं? आपके प्रदेश में अतीक और भी हैं। लेकिन कहने वाले यह भी कहते हैं कि आपसे भी ऊपर वालों से उनके संबंध उनसे और भी हैं। अब आप अपनी कानून-व्यवस्था की बात मत करना, जब आपका नाम लेकर तुम्हारे लोग पीटे जाते हों और आपके अधिकारी पीटने वालों के सरपरस्त के हाथों सम्मानित और होते हों। हमने समय रहते कहा था कि ओ आसमान वाले, जमीं पर उतर के देख। होती है क्या पिटाई, तू भी तो कभी पिट के देख। लेकिन आप तो कभी हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर से नीचे ही नहीं उतरे। उतरते भी हैं तो सिर्फ मंच पर चढ़ने के लिए। कभी जमीन पर चल कर भी तो देखिए, हकीकत पता चलती है। और फिर हवा-हवाई बातों से अलग हटकर कभी जनता के बीच आकर सच्चाई देखना भी तो राजनेता का धर्म होता है। आप से अच्छी तो हमारी बहन जी थीं, जिनके मारे प्रशासन थर-थर कांपता था। आपकी पुलिस से तो सरेआम चेन स्नैचिंग करने वाले तक नहीं पकड़े जाते हैं, जो पूछने पर यह और कह देते हैं कि उन पर सरकार का हाथ है। अब आप दंभ भर कर यह मत कह देना कि सब कुछ हमें खबर है, नसीहत न दीजिए। क्या होंगे हम खराब, जमाना खराब है। अगर खराब हो तो खुद को खराब कहो भी, फिर अच्छा होने का ढोंग क्यों करते हो? अगर आप अच्छे हो तो सिद्ध करके दिखाओ कि वास्तव में अच्छे हो और अगर यह जमाना खराब है तो इसे अच्छा बनाने की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही है? सिर्फ एक अतीक या उसके कुनबे के खात्मे से कुछ नहीं होगा। अतीक और भी हैं, जिनके आपके बड़ों से बड़े संबंध बताए जाते हैं। सच कहूं कभी-कभी यह बात बिल्कुल सच्ची लगती है कि सारे राजनीतिक दल एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। देखो कितने हट्टे-कट्टे हैं और जनता को देखो बेचारी कितनी दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है। सुना है कि विभिन्न अवसरों पर आप एक-दूसरे से मिलते-जुलते भी हो, तो फिर फिर सदन में दुश्मनी के दाव पेच क्या आप दिखावे को दिखाते हो? याद आया कि कभी-कभी तो आप सदन में रो भी पड़ते हो। लगता है जैसे राजनीति में अब रोना भी एक फैशन बन गया है। आप की देखा देखी कुछ मीडिया वाले अन्य नेताओं को समझाने लगे हैं कि आप थोड़ा सा रो और देना। चलिए अब फिर से मुद्दे पर आते हैं। मथुरा-वृन्दावन नगर निगम का चुनाव। कहीं से दिखा आम मतदाता या कि आम जनता का कोई जुड़ाव? मेरी मानिए तो यह आम जनमानस का अघोषित चुनाव बहिष्कार था। यह सिर्फ और सिर्फ सत्ता लोलुपों का संसार था, जिसमें कुछ प्रतिशत भले लोगों का भी रहा हो सकता है। लेकिन उन भलों को भला पूछता कौन है? अब आप यह मत कह देना कि भला कौन है? कई प्रत्याशी शिकायत करते रहे कि सत्तारूढ़ प्रत्याशी फर्जी मतदान करवा रहे हैं। मजिस्ट्रेट आए, सर्टिफिकेट और देकर चले गए। सब ठीक हो रहा है। भैया फिर यह उसी मतदान केन्द्र से पुलिस एक फर्जी मतदाता को पकड़ कर जीप में बैठाकर कैसे ले जाता दिखाई क्यों दे रहा है? लोगों ने मजिस्ट्रेट से कहा उनके पास प्रूफ हैं, उन्होंने यही कहा, सब ठीक है, सब ठीक चल रहा है। ज्ञानी लगे मजिस्ट्रेट साहब। मजिस्ट्रेट होते ही ज्ञानी हैं। वह भी पब्लिक की तरह सब जानते हैं, उन्हें कब कैसे चलना है? खैर जो होना था, वह तो हो गया। इतना सब कुछ होने के बावजूद देखा आपने कि आपका वोटर दिन में ही चादर तान कर सो गया। आपने मतदान का 1 घंटे का समय भी बनवाया लेकिन फिर भी मजाक कर नहीं आया 5:00 बजे के स्थान पर 6:00 बजे तक मतदान चला, फिर भी मतदान प्रतिशत इतना भर आया। फर्जी मतदान की शिकायतें अलग आईं तो फिर मतदान करने कौन आया? बेचारे मतदाता में चुनाव का घोषित बहिष्कार करने की सामर्थ्य नहीं रही होगी। इसलिए चुनाव का अघोषित बहिष्कार कर लोकतंत्र सो गया। यानी कि जो होना था, हो गया। अब हमें सिर्फ देखना यह है कि 13 मई को परिणाम क्या आता है?
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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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