हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। जिंदगी जंग है, इस जंग को जारी रखिए। मैं कलम से लिख नहीं पाऊंगा इस दौर का हाल, मेरे हाथ में कलम नहीं, तेज कटारी रखिए। श्रावण मास के लगते ही मथुरा वृन्दावन गोवर्धन बरसाना आदि के मन्दिरों में चेन स्नैचिंग की वारदातें बड़ी तादाद में शुरू हो गई हैं, जिन्हें पुलिस ने हमेशा की तरह कतई गंभीरता से न लेकर बेशर्मी की लोई ओढ़ ली है। ऐसी स्थिति में धर्म के नाम पर चलने वाली केन्द्र और राज्य सरकारों की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं और उनकी छवि धूमिल हो रही है। बात केवल चोरी उठाई गिरी की नहीं है। मुद्दा मन्दिरों में चल रहे लूटमार के ठेकों का है। ठेकों से जुड़े गिरोह के लोग पुलिस के संरक्षण में मन्दिरों में श्रद्धालुओं के मंगल सूत्र, कुण्डल, पर्स और जंजीरे खींच रहे हैं। सवाल यह भी है कि यह सोना आखिर किनके माध्यम से धनराशि में परिवर्तित होता है, जिसमें से विभिन्न वर्गों के सदस्यों को उनका हिस्सा मिलता है। जानकार बताते हैं कि प्रमुख मन्दिरों के करोड़ों-अरबों के लूटमार के ठेके चल रहे हैं। पुलिस वाले सिर्फ बहती गंगा में सिर्फ हाथ धो रहे हैं और वह कुछ नहीं कर रहे हैं। ऐसे में बृज और बृज वासियों की देश-दुनिया के लोगों के मन में क्या छवि बन रही होगी, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।सरकारों को तो जैसे अपनी छवि की बिल्कुल चिंता ही नहीं है। वह यह समझ बैठी लगती हैं कि उन्हें अब कोई हटाने वाला नहीं है। इसलिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने इस ओर से आंख कान नाक मुंह सब बंद कर लिए लगते हैं। सरकारें “एक चुप सौ को हराए” वाली कहावत पर चल रही प्रतीत होती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है जिस दिन बंसीवारे की नजर फिरेगी, परिदृश्य बदलने में एक पल नहीं लगेगा क्योंकि सारे संसार ने यह देखा है, पलटती पल में भाग्य रेखा है। जनता सब देख रही है कि आप आकर सिर्फ किसी एक मन्दिर में आरती और दर्शन कर जाते हो, आपके आगे-पीछे विभिन्न मन्दिरों में क्या होता रहा है? इस पर बिल्कुल गौर नहीं फरमाते हो। पिछले 5 दिनों के दौरान श्रद्धालुओं के साथ चेन स्नैचिंग और मोबाइल चोरी आदि की बेहिसाब घटनाएं हुई बताई गई हैं, जिनमें कुछ के ही समाचार विभिन्न माध्यमों में आ रहे हैं क्योंकि अधिकांश श्रद्धालुओं को तो उनके साथ हुई चैन स्नैचिंग और अन्य घटनाओं का तत्काल पता ही नहीं चल पाता है, जिन्हें पता चल भी जाता है, उनकी भला कौन सुनता है। उन्हें सिर्फ और सिर्फ पुलिस के दुर्व्यवहार और फटकार का ही सामना करना पड़ता है। अखबारों के समाचारों में जिस तरह का लेखन ऐसी घटनाओं के होने के बाद होना चाहिए, वह भी कहीं पढ़ने को नहीं मिल रहा है। समय ही कुछ इस तरह का चल रहा है कि यह समझिए कि अब वास्तविकता के समाचार भी ना के बराबर आ रहे हैं और सच्चाई पर उसी तरह पर्दा डाला जा रहा है, जैसे वीआईपी के आने पर नगर निगम व्दारा नालों के आगे रंगीन सीनरी लगवा दी जाती है। जरा गौर फरमाएं एक समाचार के वाक्यों पर- “मंदिरों में उमड़ी भीड़ का चोर, उचक्कों ने खूब लाभ उठाया और वारदात को अंजाम दिया।” वारदातों को वारदात ने आगे लिखा- वही पुलिसकर्मी सख्त चौकसी की बजाय वसूली में मग्न रहे। एक आरोपी पकड़ कर पुलिस को सौंपे जाने के बाद भी अन्य पकड़े नहीं जा सके। आगे और पढ़िए- “मुंबई की रहने वाली प्रीतम साहेबराव पाटील 2 जुलाई वृंदावन आईं। सुबह 9:30 बजे राधा वल्लभ मंदिर दर्शन करने गईं। यहां उनके गले से किसी ने मंगलसूत्र खींच लिया।जब तक वह कुछ समझ पातीं, चेन स्नैचर भीड़ का फायदा उठाकर गायब हो गया। प्रीतम के अनुसार सोने के मंगलसूत्र का वजन 40.5 ग्राम था, जिसकी कीमत करीब ढाई लाख रुपए थी। इस घटना की तहरीर आ जाने के बावजूद पुलिस ने पूरे 1 दिन बाद 3 जुलाई को रिपोर्ट दर्ज की। अब आप इससे अनुमान लगा लो यह रिपोर्ट भी कोई आसानी से दर्ज नहीं हुई होगी, तभी तो इसमें पूरा दिन लग गया जबकि नियमानुसार फर्स्ट इंफॉर्मेशन तत्काल दर्ज की जानी चाहिए। जवाब ने पुलिस द्वारा अपने अंतर्मन में यह भी कहा जा सकता है कि कितनी घटनाओं को तत्काल दर्ज करेंगे। अगर ऐसा करने लग गए तो फिर पुलिस का सारा समय घटनाओं को दर्ज करने में ही बीत जाएगा। फिर अन्य कार्य कब करेंगे? सारी घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज कर ली तो फिर उनका खुलासा कौन करेगा? ऐसी ही एक घटना इंदौर के संविद नगर निवासी राजेश जोगी के साथ 1 जुलाई को राधावल्लभ मंदिर में हुई बताई गई है, जिसमें उनके गले से एक मुखी रुद्राक्ष की सोने की माला ही कोई तोड़ ले गया। अब आप अनुमान लगाइए एक मुखी रुद्राक्ष भला किसी को मिल रहा है आजकल, उसकी माला वह भी सोने में गढ़ी हुई, उसकी कीमत का अनुमान आप लगा सकते हैं, कम से कम लाखों रुपए की वह माला रही होगी।
1 जुलाई को ही वृंदावन के ही श्री बांके बिहारी मंदिर में गुजरात के अहमदाबाद के रसिक भाई आदि के गले से चेन खींच ली गईं। ऐसी अनगिनत घटनाएं हुई हैं, जिनमें से कई आज अखबार में छपी हैं। चलो गनीमत है। कुछ तो छपी हैं। कुछ तो पत्रकारिता बची है। जब बची है तो उसे प्रयास कर आगे और बढ़ा लिया जाएगा। लेकिन आप यह देखिए कि आज की विधायिका और कार्यपालिका में इतनी भी नैतिकता बची है या नहीं?
दुनिया के मालिक के आगे श्रद्धालुओं की गर्दनों पर डाके डाले जा रहे हैं और सबसे खास बात यह कि सभी जगह अनगिनत कैमरे भी लगे हुए हैं। सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं। लेकिन अपराधी हैं कि पुलिस के सामने ही नहीं पड़ पा रहे हैं कि जिनसे वह मुठभेड़ कर उनकी गोली लगी अवस्था में गिरफ्तारी दिखा सके। लेकिन सच्चाई यह नहीं है। सच्चाई यह है कि जो कुछ हो रहा है, पुलिस की नॉलेज में हो रहा है। जो करने वाले हैं, वह कैमरों में भले नजर ना आते हों मगर पुलिसकर्मी उन्हें भली-भांति जानते हैं, जिनसे उनकी समय-समय पर उसकी गलबहियां भी होती हैं। अब बताइए ऐसे अपराधियों के साथ क्या पुलिस की कभी मुठभेड़ होगी?
