हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ट्रस्ट द्वारा मंदिर की विष्णु कंठ आकृति के प्लेटफार्म को हाईकोर्ट में साक्ष्य के तौर पर पेश किया जाएगा। इसके साथ ही ईदगाह के वर्तमान में इस आकृति से मिलने वाली प्रत्येक आकृति को भी चुनौती दी जाएगी। पक्षकार का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर निर्माण में जिस कला का प्रयोग किया गया है उसका बहुत सा भाग आज भी ईदगाह का हिस्सा है। फ्रांसीसी यात्री टेवर्नियर जब सन् 1650 में मथुरा आया तो उसने पाया कि मंदिर अष्टभजीय प्लेटफार्म पर टिका है। यह अष्टभुजीय आकृति लाल पत्थर की बनी थी। मंदिर के तीन गुंबद थे, जिनमें से एक बड़ा गुंबद था तो दो छोटे-छोटे गुंबद बने थे। इसका जिक्र उसने अपनी पुस्तक में किया है। मंदिर की बाहरी दीवार पर बंदर व हाथी बने थे। पक्षकार ट्रस्ट के अध्यक्ष अजय प्रताप सिंह ने बताया कि इस अष्ट भुजीय आकृति को विष्णु कंठ के नाम से जाना जाता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना गया है। इसलिए उनके मंदिर निर्माण में इस कला का प्रयोग किया गया है। हमने इसे आधार बनाते हुए ईदगाह की उन सभी आकृतियों का अध्ययन किया है जोकि अष्टभुजीय यानि की विष्णु कंठ आकृति की हैं। उन्होंने दावा किया कि ईदगाह के निर्माण के समय आक्रांताओं ने मंदिर विध्वंस का तो पूरा ध्यान रखा लेकिन उसके बाद जो ईदगाह तैयार की गई उसमें इस बात का कतई ध्यान नहीं रखा गया कि मंदिर का कोई सबूत नहीं बचे। इसलिए आज भी ईदगाह में मंदिर के बहुत से सबूत बचे हैं, जिन्हें हम हाईकोर्ट में सबूत के तौर पर पेश करेंगे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने बताया कि स्कंध पुराण में अर्जुन द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ को मथुरा का राजा बनाए जाने का उल्लेख मिलता है। बज्रनाभ कृष्ण की चौथी पीढ़ी के थे और करीब एक सौ वर्ष बाद मथुरा आए थे। उनके द्वारा ही ब्रज के प्रत्येक गांव का नाम भगवान श्रीकृष्ण द्वारा की गईं लीलाओं के नाम से रखे गए थे।
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Author: Vijay Singhal
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