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75 वर्ष के बाद श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर बन रहा द्वापरयुगीन सौभाग्य योग

ByVijay Singhal

Aug 24, 2024
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव पर 26 अगस्त को इस बार 75 वर्ष के बाद द्वापरयुगीन सौभाग्य योग बन रहा है। इसमें चार शुभ योग का संयोग है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण का 5251वां जन्मोत्सव विशेष है। भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर व्रत रखने से भक्त की मनोकामना पूर्ण होंगी और दो गुना फल प्राप्त होगा। ज्योतिषाचार्य अजय तैलंग ने बताया कि भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ था। साधक भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर व्रत रख कृष्ण कन्हैया की भक्ति भाव से पूजा-अर्चना करते हैं। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर दशकों बाद द्वापरकालीन शुभ संयोग का निर्माण हो रहा है। उन्होंने बताया कि द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था उस बेला में रोहणी नक्षत्र के साथ अष्टमी की सूर्य बेला सर्वार्थ सिद्धि योग एवं लक्ष्मी योग था यह संयोग इस वर्ष भी पड़ रहा है। वैदिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 26 अगस्त को देर रात 3 बजकर 39 मिनट पर शुरू होगी। इस तिथि का समापन 27 अगस्त को देर रात 2 बजकर 19 पर होगा। भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए शुभ समय 27 अगस्त को देर रात 12 बजकर 1 मिनट से लेकर 12 बजकर 45 मिनट तक है। इस समय में साधक भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कर सकते हैं।

द्वापरकालीन शुभ संयोग
सावन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर कृतिका नक्षत्र का संयोग दोपहर 3 बजकर 56 मिनट से हो रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण के समय रोहिणी नक्षत्र का संयोग रहेगा। इस दिन चंद्रमा भी वृषभ राशि में रहेंगे। चंद्रमा का गोचर 25 अगस्त को रात 10.19 मिनट पर वृषभ राशि में होगा। इसलिए मन के कारक चंद्र देव भी वृषभ राशि में रहेंगे। भगवान श्रीकृष्ण की लग्न राशि वृषभ है। इस शुभ अवसर पर हर्षण योग का निर्माण रात 10.18 मिनट से हो रहा है। वहीं, सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग संध्याकाल 3.55 मिनट से हो रहा है। इस योग का समापन 27 अगस्त को सुबह 5. 57 मिनट पर होगा। इसके अलावा, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर शिववास योग भी है।

इस शुभ अवसर पर भगवान शिव कैलाश पर जगत की देवी मां गौरी के साथ विराजमान रहेंगे। अबके सर्वार्थ सिद्धि योग तथा कृतिका नक्षत्र का उत्तम संयोग बना रहा है। इस नक्षत्र में भगवान लड्डू गोपाल की पूजा करने से मनुष्य अपनी सभी मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति कर सकता है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पूजा पूरे विधि-विधान और सभी सामग्रियों के साथ करना चाहिए, तभी भगवान श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं।

केले के पत्ते पर विराजमान कान्हा विशेष
जन्माष्टमी की पूजा के लिए आपको केले के पत्ते पर विराजमान श्री कृष्ण की तस्वीर लेनी चाहिए। पूजा के लिए गुलाब, गेहूं, चावल, लाल कमल के फूल और भगवान के लिए सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों की भी व्यवस्था करनी चाहिए। सर्वप्रथम मंदिर में सफेद कपड़ा या लाल कपड़ा बिछाएं, उस पर भगवान श्री कृष्ण को स्थापित करें।

पूजा विधि
भगवान के सामने एक कलश रखें तथा उसके ऊपर एक घी का दीपक जलाएं. धूप बत्ती अगरबत्ती और कपूर भी जलाएं। इसके बाद भगवान को चंदन, केसर, कुमकुम आदि का तिलक करें, उनके ऊपर अक्षत अर्पित करें। अबीर, गुलाल, हल्दी आदि चढ़ाएं. उन्हें सुंदर आभूषण पहनाएं, पान के पत्ते पर सुपारी रखकर उनके सामने अर्पित करें। उन्हें पुष्पमाला भेंट करें और तुलसी की माला भी चढ़ाएं।

भोग में क्या करें शामिल
लड्डू गोपाल के भोग में दूध, दही, देसी घी, गंगाजल, मिश्री, शहद, पंचमेवा और तुलसी को जरूर शामिल करें। इसके अलावा उन्हें मिठाई, फल, लॉन्ग, इलायची, झूला सिंहासन पंचामृत भेंट करें। भगवान श्री कृष्ण का शृंगार जन्माष्टमी के पर्व पर भगवान श्री कृष्ण को शृंगार स्वरूप मोर पंख से बने वस्त्र पहनाएं। लड्डू गोपाल को मोर मुकुट बेहद प्रिय है, इसलिए उस दिन उन्हें मोर मुकुट जरूर पहनाना चाहिए जिससे वह बेहद प्रसन्न होते हैं। उसके बाद उन्हें पाजेब पहनाएं, हाथों में कंगन, कमर में कमरबंद बांधें, उनके हाथ में बांसुरी रखें और साथ ही भगवान श्री कृष्ण का शृंगार करते समय उन्हें कुंडल और तुलसी की माला अवश्य पहनाएं।

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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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