हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा वृंदावन में बड़ी समस्या बन चुके बंदरों से निजात दिलाने के लिए अब नगर निगम ने उनको पकड़ने के लिए टेंडर उठाया है। इस टेंडर के तहत उत्पाती बंदरों को पकड़ा जाएगा और उन्हें खादर में या जंगलों में छोड़ा जाएगा। बंदर पकड़ने के लिए दो अलग अलग लोगों को ठेका दिया गया है। जिसमें से एक टीम मथुरा में तो दूसरी वृंदावन में बंदरों को पकड़ेगी। मथुरा वृंदावन में बंदरों को पकड़ने का टेंडर जारी होते ही पिंजरे लगा दिए गए। मथुरा के चौबिया पाड़ा मोहल्ले में छतों पर पिंजरे रख दिए गए हैं और बंदर पकड़ने वाले लोग शनिवार से इस अभियान की शुरुआत करेंगे। नगर निगम द्वारा उठाए गए टेंडर में एक बंदर पकड़ने पर 95 रुपए दिए जायेंगे। इसमें बंदर को खाने पीने का सामान देने,पकड़ने और उनको निर्धारित जगह पर छोड़ने तक की राशि शामिल है। एक अनुमान के मुताबिक मथुरा वृंदावन में 40 हजार से ज्यादा बंदर हैं हालांकि नगर निगम इनकी संख्या 10 से 15 हजार मानता है। बंदरों को पकड़ने के बाद शहर के किसी दूसरे इलाके में न छोड़ा जाए इसका भी ध्यान रखा जायेगा। बंदर पकड़ने वाली टीम के साथ नगर निगम का कर्मचारी रहेगा इसके अलावा पकड़े गए बंदरों पर रंग से निशान भी लगाए जायेंगे जिससे पहचान रहे। बंदरों को खादर में और कोसी के समीप स्थित वन क्षेत्र में छोड़ने की वन विभाग से नगर निगम को अनुमति मिली है। मथुरा वृंदावन में बंदरों का आतंक इस कदर है कि यहां के किसी भी इलाके में लोग बिना लाठी के अकेले नहीं निकल सकते। यह बंदर इस कदर उत्पाती हो गए हैं कि प्रतिदिन किसी न किसी पर हमला कर देते हैं। बंदरों का आतंक यहां इस कदर व्याप्त है कि नगर निगम के चुनाव में इस समस्या को मुद्दा बनाया गया था।मेयर विनोद अग्रवाल ने चुनाव जीतने के बाद समस्या से निस्तारण का वादा भी किया था। बंदरों का आतंक किस कदर है इसकी बानगी देखने को मिली 15 अगस्त को। यहां बंदरों के दो गुटों में लड़ाई हुई और वृंदावन में मकान का एक बड़ा हिस्सा गिर गया। मकान का हिस्सा गिरने से 5 श्रद्धालुओं की मौत हो गई वहीं 4 अभी भी अस्पताल में भर्ती हैं। इसी तरह का हादसा मथुरा के भैंस बहोरा इलाके में हुआ। यहां 31 जुलाई को बंदरों ने लड़ते लड़ते मकान का छज्जा गिरा दिया जिसकी वजह से मकान के नीचे बैठे युवक की मौत हो गई थी। वृंदावन में तो स्थिति यह है कि यहां क्या श्रद्धालु,क्या स्थानीय खुले में चश्मा ही नहीं लगा सकता। चश्मा लगा कर सड़क पर निकलते ही बंदर उसे लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं। इसके बाद यह सॉफ्ट ड्रिंक देने पर ही देते हैं। यह बंदर कई बार पर्स और मोबाइल को ले जाने से भी नहीं चूकते। मौका मिलते ही इतनी सफाई से यह बंदर पर्स,मोबाइल और चस्मा छीनते हैं कि व्यक्ति को ले जाने के बाद पता चलता है। इसके बाद फ्रूटी सॉफ्ट ड्रिंक देने पर ही समान वापस मिलता है। बंदरों के आतंक का समाना ऐसा नहीं है कि आम इंसानों को ही भुगतना पड़ता हो। इनका शिकार वीआईपी भी हो जाते हैं। तत्कालीन डीएम नवनीत चहल बांके बिहारी क्षेत्र का निरीक्षण कर रहे थे इसी दौरान एक बंदर उनका चश्मा ले गया। जिसके बाद पुलिस की फौज लगी और बंदर को फ्रूटी दी तब जा कर चश्मा मिला। इससे पहले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के दौरे के दौरान बंदरों के हमले से बचने के लिए लंगूर तैनात किए गए थे। बंदरों की समस्या से निजात को लेकर कई बार मांग उठी। सांसद हेमा मालिनी ने मंकी सफारी बनाने की बात कही लेकिन प्रस्ताव कागजों से आगे बढ़ ही नहीं सका। बंदरों को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया था कि हनुमान चालीसा पढ़ो बंदर परेशान नहीं करेंगे। वहीं पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने बंदरों से दोस्ती करने का बयान दिया था।
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Author: Vijay Singhal
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