हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा रसिक पूजनीय हैं और यहां विद्वता का आदर किया जाता है। यमुना पुल के नीचे नागनाथ आश्रम में शिवमंदिर में भोलेनाथ के बड़े उपासक रावण की भी आराधना की जाती है। मान्यता है कि रावण इस प्राचीन मंदिर में अपने आराध्य शिव की उपासना करता था। रावण की इष्ट के रूप में आराधना करने वाले दशहरे पर दशानन के पुतले फूंकने का भी विरोध करते हैं। त्रेता युग में लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए भगवान राम ने समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना कर उपासना की थी। यह पूजन आचार्य के रूप में रावण ने कराया था, ठीक उसी तरह इस मंदिर में राम और रावण की शिव अराधना की मुद्रा में प्रतिमा है, जिसकी श्रद्धालु पूजा करते हैं। मंदिर में एक साल पहले रावण की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। दशहरे पर जब लोग रावण के पुतला दहन करेंगे तो यहां रावण के उपासक उनकी पूजा करेंगे। मंदिर में रावण की प्रतिमा स्थापित करने वाली ओमवीर सारस्वत बताते हैं कि मान्यता के अनुसार मथुरा त्रेता युग में मधुपुरी के नाम से जाना जाता था। रावण की बहन कुंभिनी का विवाह मधु राक्षस के साथ हुआ। अपनी बहन से मिलने के लिए जब कभी रावण यहां आता तो यमुना के किनारे इसी प्राचीन शिव मंदिर में आराधना करता था। सारस्वत समाज करता है पुतला फूंकने का विरोध
सारस्वत समाज के लोग रावण के पुतले के दहन का विरोध करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि रावण प्रकांड विद्वान और वेदों का ज्ञाता था। रावण की भगवान शिव के प्रति भक्ति और वेदों का ज्ञाता होने के बाद महा शक्तियों का समावेश देखकर श्री राम ने भी उसे आचार्य के रूप में पूजा था। हिंदू संस्कृति के अनुसार मृतक का एक ही बार पुतला जलाया जाता है। विजयादशमी पर रावण का पुतला दहन किया जाता है, जो कि अनुचित है।
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Author: Vijay Singhal
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