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रसोपासक संत हैं प्रेमानंद..भाव ही है उनका ज्ञान

ByVijay Singhal

Aug 26, 2025
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। श्री तुलसीपीठाधीश्वर जगद्गुरू रामभद्राचार्य महाराज के संत प्रेमानंद को चुनौती देने पर संत समाज अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। वृंदावन के कई संतों और प्रेमानंद के अनुयायियों का कहना है कि प्रेमानंद रसिक परंपरा के संत हैं। वह रसोपासना करते हैं जिसका पैमाना कोई भाषा या विद्वता नहीं है। उसका एक ही भाव है और वह है राधा चरण प्रधान उपासना। रामभद्राचार्य को यह समझना चाहिए। दरअसल रामभद्राचार्य ने संत प्रेमानंद महाराज को लेकर बयान दिया था। कहा था कि वह मेरे सामने संस्कृत बोलकर दिखाएं और मेरे श्लोकों के अर्थ समझा दें। वह तो इस अवस्था में मेरे बालक के समान हैं। हालांकि सोमवार की देर रात रामभद्राचार्य ने कहा कि उनका आशय यह नहीं था। उनके इस बयान पर वृंदावन में प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है। राधा वल्लभ संप्रदाय के विद्वान डा. चंद्रप्रकाश शर्मा हित किंकर कहते हैं संत प्रेमानंद रसोपासना में दीक्षित संत हैं। वह उस संतों की उस त्रिवेणी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जिसमें केवल राधा नाम की चरण उपासना को ही सर्वोपरि माना है। गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु, स्वामी हरिदास और स्वामी हरिराम व्यास जी की इस रसोपासना परंपरा में साधन को साध्य नहीं बल्कि कृपा को साध्य माना गया है। इसके उपासना के संत किसी को प्रभु पाने का साधन जैसे ये करो या वह कर लो नहीं बताते हैं। केवल कृपा और नाम जाम की बात करते हैं। इस उपासना का भाव मधुर रस है। इसमें साधक केवल भगवान के मधुर स्वरूप, लीला और नाम मेें डूबकर आनंद प्राप्त करने को ही लक्ष्य मानता है न कि किसी सांसारिक या भौतिक सुख की प्राप्ति को। वह हर समय यह महसूस करते हैं कि उनके ईष्ट उनके साथ ही हैं। यह विशेष तौर पर वृंदावन की उपासना है। इसके उपासक के लिए यह जरूरी नहीं कि वह संस्कृत का ज्ञाता हो।
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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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