हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा के कोसिकलां कस्बा से करीब 12 किलोमीटर दूर शेरगढ़ रोड पर स्थित फालैन गांव को प्रह्लाद नगरी भी कहा जाता है। यहां प्रह्लाद का कुंड और मंदिर है। फालैन गांव में जलने वाली होली की पूजा करने के लिए 12 गांव से महिला और पुरुष यहां आते हैं।ये लोग अपने साथ उपले, गुलरी आदि लाते हैं। गांव में बच्चे सांकेतिक रूप में होलिका दहन करते हैं, लेकिन परिवार के लोग पूजा फालैन में आ कर ही करते हैं। सैकड़ों वर्ष पुरानी इस परंपरा का आज भी निर्वहन किया जा रहा है।दरअसल होलिका दहन के दिन फालैन गांव में खास होली होती है। मान्यता है कि हिरण्य कश्यप की बहन होलिका ने भक्त प्रह्लाद को जलाने का प्रयास किया था, लेकिन इसमें असफल रही थी। इस कथा को जीवंत करने के लिए फालैन गांव के पंडा परिवार का एक सदस्य जलती होलिका से निकलता है। धधकती आग, लाठी लेकर आस-पास चिल्लाते लोग और आग से निकलता व्यक्ति। यह किसी फिल्म का सीन नहीं है। बल्कि रीयल है। इस हैरतअंगेज कारनामे को मथुरा के फालैन गांव के मोनू पंडा ने कर दिखाया है। इसे वह चार सालों से कर रहे हैं। गांव के लोगों के अनुसार, मोनू ने रात को निर्धारित लग्न में दीपक जलाया। जब तक इसकी लौ गर्म रहती है, वह जप करते हैं। लौ ठंडी होने के बाद ही मोनू होलिका की अग्नि में प्रवेश करने के इशारा करते हैं। फिर होलिका में अग्नि प्रज्वलित की जाती है। फिर ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4.30 बजे मोनू ने प्रह्लाद कुंड में स्नान किया। इसके बाद वह सीधे दौड़ते हुए आए और जलती होली से निकल गए। इस दौरान उनकी बहन लोटे में जल लेकर उनके अग्नि से निकलने वाले रास्ते पर डालती रहीं। मोनू पंडा जैसे ही जलती होली की अग्नि में से निकले वैसे ही पूरे गांव में भक्त प्रह्लाद और और भगवान नरसिंह के जयकारे लगने लगे। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु फालैन गांव पहुंचे हैं। मोनू पंडा ने बताया, ”इस बार मैं चौथी बार जलती होली से निकला हूं। जितना तीन साल में आनंद नहीं आया, उससे कहीं ज्यादा चौथी बार में आनंद आया है। इसके लिए मुझे 40 दिन पहले से तैयारी करनी होती है। इस दौरान मैं 40 दिन व्रत रहता हूं। मैं केवल एक बताशा और एक लौंग खाता हूं। मेरे ऊपर भगवान प्रह्लाद की कृपा है। जब मैं होली से निकलता हूं तो मेरे साथ भगवान प्रह्लाद रहते हैं। उन्हीं की कृपा से मैं जलती होली से निकल पाता हूं। मंदिर में पूजा करने के बाद सीधे होली की अग्नि में प्रवेश करता हूं। इसमें मुझे बहुत आनंद मिलता है। पांच गांव के लोगों और परिवार के लोगों का पूरा साथ रहता है। सभी लोगों इसके लिए भगवान से कृपा की कामना करते हैं। होली मेल मिलाप का पर्व है। होली में अपनत्व की इसी परंपरा को आगे बढ़ाकर गांव निभा रहा है। फालैन गांव में चर्चित होलिका दहन की परंपरा ने रिश्तों की डोर बांध रखी है। यहां फालैन गांव के साथ 12 अन्य गांव की होली एक ही स्थान पर रखी जाती है, जिसका सभी दहन करते हैं। फालैन गांव में होने वाले होलिका दहन में आसपास के 12 गांव के लोग होली पूजते हैं। यहां फालैन के अलावा, सुपाना, विशम्भरा, नगला दस विसा , महरौली, नगला मेव, पैगांव , राजगढ़ी, भीमागढ़ी , नगला सात विसा, नगला तीन विसा और बल्लगढ़ी के लोग पूजा करने आते हैं। फालैन की होली देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। होलिका के अंगारों से जब पंडा निकलता है, तो पल भर के लिए लोग अपनी आंखों-देखी पर विश्वास नहीं कर पाते। फालैन गांव में लोग बताते हैं कि हजारों वर्ष पहले इस गांव के पंडा परिवार को स्वप्न आया कि पेड़ के नीचे भक्त प्रह्लाद और भगवान नृसिंह की प्रतिमा दबी हैं। इसके बाद पंडा ने एक संत के निर्देश पर स्वप्न में दिखाई दिए स्थान पर खुदाई की, जहां से एक प्रतिमा निकली। इसके बाद पंडा परिवार को संत ने आशीर्वाद दिया कि इस परिवार का जो भी व्यक्ति भक्त प्रह्लाद की भक्ति करेगा , वह जलती होली से निकलेगा।
