हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ़ विजय सिंघल
मथुरा। गोवर्धन में भोर की पहली किरण के साथ गिरिराज परिक्रमा मार्ग पर गूंजता ‘हरे कृष्णा-हरे कृष्णा, राधे-राधे’ का संकीर्तन, माथे पर तिलक, गले में चंदन की माला और तन पर धोती-कुर्ता पहने विदेशी श्रद्धालुओं की कतारें। कोई हाथों में श्रीमद्भगवद्गीता लिए कृष्ण नाम में मगन है तो कोई भक्ति की धुन पर झूमता हुआ गिरिराजजी की परिक्रमा कर रहा है। कहीं राधाकुंड में राधारानी का पूजन हो रहा है तो कहीं गोशाला में गायों को फूलों से सजाकर उनकी सेवा की जा रही है। कार्तिक में ब्रजभूमि का यह दृश्य मानो सात समंदर पार की संस्कृतियों को कृष्ण भक्ति के एक सूत्र में पिरो रहा है। रूस, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोप से आए इन श्रद्धालुओं के लिए ब्रज केवल तीर्थ नहीं, आस्था और आत्मिक शांति का ऐसा ठिकाना बन गया है, जहां आने के बाद बार-बार लौटने का मन करता है। ब्रज की संस्कृति में रंगे इन विदेशी भक्तों का आकर्षण केवल गिरिराजजी की परिक्रमा तक सीमित नहीं है। वे राधाकृष्ण की भक्ति के साथ यहां की सेवा परंपरा को भी अपना रहे हैं। कई श्रद्धालुओं ने राधा, मीरा, ललिता, कान्हा, बलदेव और सुदामा जैसे नाम रख लिए हैं। धोती-कुर्ता और पगड़ी पहने पुरुषों के साथ ब्रज की गोपियों जैसे परिधान धारण किए विदेशी महिलाएं भी भक्ति में लीन नजर आती हैं।
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माथे पर तिलक और जुबां पर राधे-कृष्ण, सात समंदर पार से ब्रज आए कान्हा के दीवाने; चढ़ा भक्ति का रंग
