हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ़ विजय सिंघल
मथुरा। शरद पूर्णिमा की रात सोलह कलाओं से परिपूूर्ण चंद्रमा की धवल चांदनी में लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार होकर अपने हाथों में वर और अभय लिए पृथ्वी पर भ्रमण करने निकली थीं, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शरद पूर्णिमा की रात वंशीवट पर गोपियों संग महारास किया तो इस तिथि का महत्व और भी बढ़ गया। इसीलिए शरद पूर्णिमा को महारास की पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वृंदावन शोध संस्थान के शोध अधिकारी डॉ. राजेश शर्मा ने बताया नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की श्वेत धवल चांदनी में विष्णुप्रिया माता लक्ष्मीजी अपने वाहन पर सवार होकर पृथ्वी लोक पर भ्रमण के लिए निकली थीं। परंतु धार्मिक मान्यता है कि अश्विन मास की पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा की अद्भुत दिव्य रासलीला भी इसी रात को हुई थी। शास्त्रों के अनुसार, माता लक्ष्मी का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था, इसलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। कुंआरी कन्याएं इस दिन सुबह सूर्य और चंद्रदेव की पूजा करके मनचाहा वर की प्राप्ति की कामना करती हैं।
शरद पूर्णिमा: लक्ष्मी भ्रमण और श्रीकृष्ण महारास का दिव्य महत्व, ग्रंथों में मिलता है महात्म्य का वर्णन
