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श्रद्धा-भक्ति के धरातल पर खास है वृंदावन की वन संस्कृति, विजय सिंघल

ByVijay Singhal

Jun 6, 2026
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। भारतीय किसान यूनियन के महानगर अध्यक्ष ने कहा वृंदावन के साथ जुड़ा वन शब्द आज भले ही वृंदा की उस मूल स्थिति को नहीं दर्शाता हो, जहां लता-पता और वृक्षावलियां ही इस नगर की मुख्य पहचान थीं। इस पहचान की समृद्ध सांस्कृतिक यात्रा है। श्रृद्धा-भक्ति के धरातल पर नगर की प्राचीन वन संस्कृति लगभग 6वीं सदी में महाकवि कालीदास से लेकर सन 1829 के दौरान नगर यात्रा को आए फ्रांसिसी यात्री जैक मांट ने इसे हरा द्वीप बताया, लेकिन अब वह हरित वृंदावन तेजी से कंक्रीट के वन में बदलता जा रहा है। इसके बावजूद नगर के प्राचीन धर्म स्थल यहां आने वाले भक्तों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।
सदियों से वन संस्कृति के लिए जाना जाने वाला वृंदावन का स्वरूप विकास के नाम पर खोता जा रहा है। अपनी प्राचीन छाप को मिटाकर अब बहुमंजिला इमारतों के रूप में दिखने लगा है। 6वीं सदी में महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में चैत्ररथ के उद्यान की उपमा नगर से की थी। वृंदावने चैत्र रथादनूने निर्विश्यतां सुंदरि यौवनश्री… चैत्ररथ का उद्यान वृंदावन की तरह सुंदर है। वहीं वर्ष 1829 के दौरान यहां यात्रा पर आए आए फ्रांसिसी यात्री जैक मांट ने इसे एक हरे द्वीप की तरह बताया है। नगर की लता वृक्षावलियां श्रद्धा के धरातल पर जिस सांस्कृतिक यात्रा को दर्शाती हैं, वह खास है। 16वीं सदी के दौरान यह जिन विविधताओं के साथ मुखरित होता है, वह पर्यावरण के संदर्भ में वन-वृंदावन को एक धरोहर के रूप में स्थापित करने वाला है।
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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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