2015-16 बेसिक शिक्षा विभाग में मेरिट के आधार पर 15 हजार सहायक अध्यापकों की भर्ती निकली थी। इसमें दाऊदयाल संस्थान खंदारी, आगरा के नाम से स्नातक के कूटरचित दस्तावेज तैयार कराकर आरोपियों ने आवेदन किया। लखनऊ से मेरिट के आधार पर काउंसलिंग के लिए तिथि जारी की गई। तय तिथि पर बेसिक शिक्षा विभाग में काउंसलिंग के बाद दस्तावेज जमा हुए। वहां से दाऊदयाल संस्थान के लिए आगरा भेजे गए। मगर, संस्थान में सत्यापन को दस्तावेज पहुंचते उससे पहले ही डाकिया से सांठगांठ कर आरोपियों ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। खुद ही सत्यापन की रिपोर्ट लगाकर बीएसए कार्यालय को भेज दिए। बाद में शिकायतें हुईं। तब यह मामला खुला। मगर, विभागीय कर्मचारी और पुलिस की संलिप्तता के कारण मुकदमा दर्ज नहीं हो सका।समय-समय पर मामला उठता रहा, बावजूद ये शिक्षक लगातार नौकरी करते रहे। न तो इनकी जांच ही की गई, न ही इन पर कोई कार्रवाई की गई और न ही इन्हें वेतन दिया गया। जबकि कई बीएसए आए और गए। निवर्तमान बीएसए वीरेंद्र कुमार सिंह व कुछ कर्मियों की मदद से 5 संदिग्ध शिक्षकों ने वेतन आदेश जारी कराने में सफलता पा ली। इस पर वित्त एवं लेखाधिकारी (एओ) कार्यालय ने आपत्ति दर्ज कराते हुए पुनर्विचार को पत्र लिखा। वेतन रुकने पर इनमें से एक शिक्षक कोर्ट पहुंच गया। उसने बीएसए के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार पत्र लिखने को एओ के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात कहते हुए न्यायालय से वेतन दिलाने की मांग की।
न्यायालय ने एओ से शपथ पत्र मांगा और आश्चर्य जताया कि कैसे यह शिक्षक विगत 8 वर्ष से लगातार नौकरी कर रहे हैं। न तो इन्हें वेतन दिया जा रहा है न ही इनकी जांच की गई। कोर्ट ने प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा को 15 दिन में जांच करते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने के लिए 27 सितंबर तक समय दिया। इसके बाद बीएसए सुनील दत्त ने उन पांच सहित 19 शिक्षकों के खिलाफ थाना हाइवे में तहरीर देकर मुकदमा दर्ज कराया था।
