हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
उत्तर प्रदेश विधानसभा ने आज आधा दर्जन पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों को कारावास की सजा सुनाई है। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने जिन पुलिस अधिकारी कर्मचारियों को यह सजा सुनाई है, उनमें से एक (सीओ) सेवानिवृत्त हो चुके हैं जबकि शेष सभी 05 लोग अभी सेवा में हैं। यह सभी इस समय विधानसभा में कैद की सजा भुगत रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा ने जिन पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों को आज सजा सुनाई है, वह वर्ष 2004 के क्षेत्राधिकारी कानपुर नगर अब्दुल समद (जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं) के अलावा उस समय के किदवई नगर थाना अध्यक्ष ऋषि कान्त शुक्ला, एसआई त्रिलोकी सिंह और सिपाही छोटे सिंह यादव तथा उसी समय के काकादेव थाने के सिपाही विनोद मिश्रा और मेहरबान सिंह हैं। मामला कुछ इस तरह बताया गया है कि कानपुर के तत्कालीन भाजपा विधायक सलिल विश्नोई के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल बिजली कटौती को लेकर डीएम कानपुर नगर को ज्ञापन देने जा रहा था। इस दौरान इन पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों ने श्री विश्नोई से अभद्रता कर डाली। 15 सितंबर 2004 की इस घटना के संबंध में 25 अक्टूबर 2004 को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया गया, जिसका फैसला करीब साडे 18 साल बाद आया है। इस मामले में विशेषाधिकार हनन समिति द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के आधार पर विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों को 1 दिन के कारावास की सजा सुनाई। इससे पूर्व संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने उनसे यह सजा सुनाने की सिफारिश की थी। उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष द्वारा सुनाए गए फैसले के अनुसार इन सभी को आज रात 12:00 बजे तक विधानसभा के विशेष प्रकोष्ठ कक्ष में कैद रखा गया है, जिसमें इनके लिए भोजन आदि की व्यवस्था भी की गई है। आज की इस खबर से यह संदेश मिलता है कि यदि गलती करोगे तो उसका फल आपको जरूर मिलेगा। आज नहीं तो कल अवश्य मिलेगा क्योंकि कहते हैं भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं है। अब तो यह भी कह रहे हैं कि पॉपुलेशन अधिक बढ़ जाने के कारण अगले जन्म की व्यवस्था नहीं चल रही है। इस जन्म का हिसाब-किताब इसी जन्म में चुकता किया जा रहा है जबकि गलत करने वाला यह कहता है कि अरे अगले जन्म की किसने देखी? इस जन्म में जो करना है, वह तो कर लो। ऐसे में जब उसे पद, अधिकार के अलावा यदि संरक्षण और मिल जाता है तो वह हद से गुजर जाता है और उस का परिणाम ऐसे फैसलों के रूप में सामने आता है। सारांश यह है कि ऐसा कोई कर्म मत करो कि जिसका फल देर-सवेर ऐसा आए। गौरतलब बात यह है कि एक विधायक के साथ हुई घटना और विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिए जाने के बावजूद इस मामले का निर्णय आने में लगभग 2 दशक लग गए जबकि मथुरा की एक अदालत ने अभी पिछले दिनों सिर्फ 40 दिन के अन्दर ही एक आरोपी को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। अब यह कहना शेष नहीं रह जाता कि विधान बनाने वाली विधानसभा को ही विधान के अनुरूप दंड देने में इतना समय लग रहा है तो व्यवस्था में अभी कितनी गति लाए जाने की आवश्यकता है, जिससे इस प्रकार के निर्णय शीघ्र आ सकेंं और सभी के लिए सस्ते और सुलभ न्याय की परिकल्पना मूर्त रूप ले सके। देर से मिले न्याय को लेकर जो कहावत है, उसकी बजाय सदन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए सकारात्मक भाव से यही कहा जाना चाहिए कि देर आए, दुरुस्त आए। महान पुरुष विधानसभा अध्यक्ष हैं तो फिर ऐसे निर्णयों के आगे भी आते रहने की अपेक्षा रखी जानी चाहिए। यह मथुरा की खुशकिस्मती है कि आप अपने मन्त्रित्वकाल में यहां आकर बैठकें लेते रहे और अपना मार्गदर्शन स्थानीय अधिकारियों को देते रहे। वैसे भी जब सतीश महाना जैसे महान पुरुष विधानसभा अध्यक्ष हैं तो फिर ऐसे निर्णयों के आगे भी आते रहने की अपेक्षा रखी जानी चाहिए। यह मथुरा की खुशकिस्मती है कि आप अपने मन्त्रित्वकाल में यहां आकर बैठकें लेते रहे और अपना मार्गदर्शन स्थानीय अधिकारियों को देते रहे।
