कोर्ट में दाखिल किए गए वाद के अनुसार इस मंदिर को सन 1670 में मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद मंदिर में स्थापित बेशकीमती रत्न जड़ित छोटी बड़ी भगवान की प्रतिमाओं को आगरा ले जाया गया। जहां बेगम साहिबा की मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दबा दिया। वाद में दाखिल किए गए दावा के अनुसार यह विग्रह आज भी आगरा के लाल किले में दीवाने खास के पास बनी बेगम साहिबा मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दबी हुई हैं। कोर्ट में दाखिल किए गए वाद में कुछ पुस्तकों का जिक्र किया गया है। दाखिल वाद में लिखा गया है कि इसका जिक्र औरंगजेब के दरबारी साकी मुस्तैक खान ने अपनी पुस्तक मासर ई आलमगिरी में किया गया है जिसका अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद सर दुनाथ सरकार द्वारा किया गया। इसी प्रकार का उल्लेख बी एस भटनागर द्वारा लिखित पुस्तक Emperor Aurangzeb And Destruction Of Temple में भी मिलता है। इसके अलावा कृष्ण दत्त बाजपई द्वारा लिखित पुस्तक ब्रज का इतिहास में भी इसका जिक्र है। वादी महेंद्र प्रताप और श्यामानंद ने कोर्ट में दाखिल किए गए वाद में लिखा है कि इस मामले में प्रतिवादी अधिकारियों को देव विग्रहों के बारे में बताया गया और उन्हें निकलवा कर मूर्तियों को केशव देव मंदिर में स्थापित करने के लिए कहा लेकिन प्रतिवादियों ने कोई बात नहीं मानी। वादी ने इस मामले में दीवानी न्यायालय की प्रक्रिया संहिता की धारा 80 के अंतर्गत नोटिस भी दिया लेकिन प्रतिवादियों ने नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। इस मामले में कोर्ट ने 23 जनवरी की डेट सुनवाई के लिए निर्धारित की है।
