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व्रन्दावन में सोने से बने गरुड़ वाहन पर निकले रंगनाथ:चहुंओर गूंजे भगवान के जयकारे,

ByVijay Singhal

Mar 12, 2023
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिघल
मथुरा। व्रन्दावन में रंगनाथ के दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव के तीसरे दिन यानी रविवार को भगवान सोने से बने गरुड़ वाहन पर विराजमान हुए। स्वर्ण निर्मित गरुड़ वाहन पर विराजमान भगवान के दर्शन कर श्रद्धालु आनंद में डूब गए। चहुंओर भगवान रंगनाथ के जयकारे गूंजने लगे। इससे पहले दूसरे दिन देर शाम भगवान की सवारी चांदी से बने हंस पर विराजमान होकर निकली। रथ मंडप से भगवान की सवारी वैदिक मन्त्रोच्चार के मध्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि के बीच पुष्करिणी द्वार पर पहुंची। यहां करीब 1 घंटे तक सवारी खड़ी रखी गई। मथुरा के वृंदावन में स्थित दक्षिण भारतीय शैली के श्री रंगनाथ भगवान का दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव चल रहा है। इस उत्सव में भगवान सोने चांदी के विभिन्न वाहनों पर विराजमान हो कर भक्तों को दर्शन देने के लिए उनके बीच जाते हैं। वैसे तो मंदिर में वर्ष भर के 365 दिनों में 380 से ज्यादा उत्सव मनाए जाते हैं। लेकिन यह उत्सव सबसे खास है। इसे मंदिर का वार्षिकोत्सव भी कहा जाता है और उत्तर भारत में इसे रथ के मेला के नाम से जाना जाता है। पुष्करिणी द्वार पर गरुड़ पर विराजमान भगवान की सवारी खड़ी रहने के पीछे मान्यता है कि प्रति वर्ष दक्षिण भारत में भगवान के अनन्य भक्त दूधा स्वामी जी ब्रह्मोत्सव के अवसर पर दर्शन के लिए जाते थे। लेकिन, एक वर्ष वह गरुड़ पर विराजमान भगवान की सवारी के दर्शन करने के लिए अस्वस्थ होने के कारण नहीं पहुंचे। जिस पर जब भगवान की सवारी शुरू हुई तो भगवान गरुड़ जी को छोड़कर अचानक गायब हो गए। काफी देर तक पर्दा लगाए रखा गया। पुजारी ने प्रार्थना की और पर्दा हटाकर देखा तो भगवान गरुड़ जी विराजमान थे। बाद में ज्ञात हुआ कि भगवान अपने अनन्य भक्त को दर्शन देने उनके स्थान पर गए थे। तभी से करीब 1 घंटे के लिए सवारी को द्वार पर खड़ा किया जाता है। पक्षी राज गरुड़ जी वेदों की आत्मा है। उनके पंखों से सामवेद का गायन होता है। स्वर्ण निर्मित ऐसे गरुड़ जी पर वेद वैद्य भगवान विराजते हैं। इसी वाहन पर विराज कर भगवान गजराज को ग्राह के फंदे से मुक्त कराते हैं। इनके दर्शन से क्रूर ग्रहों की शांति होती है दुस्वप्न दूर होते हैं। वेद परायण का फल प्राप्त होता है और पक्षी योनि से मुक्ति मिल जाती है। ब्रह्मोत्सव के दूसरे दिन शाम के समय भगवान की सवारी रजत यानी चांदी से बने हंस पर विराजमान हो कर निकली। रथ मंडप से भगवान हंस पर विराजमान हो कर आकर्षक श्रृंगार के साथ बारह द्वारी स्थित मंडप के समक्ष पहुंची। जहां कुछ देर रुकने के बाद भगवान की सवारी नगर भ्रमण के लिए निकली। इस दौरान जगह जगह पर भक्तों ने आरती की। ब्रह्मोत्सव के दौरान निकलने वाली हंस की सवारी के पीछे मान्यता है कि भगवान हंस के रूप लेकर ब्रह्मा जी से पूछे गए प्रश्नों का उत्तर सनकादिक ऋषियों को दिया था। ब्रह्मा जी ने कृतज्ञता के रूप में भगवान के इस रूप की विस्तृत स्तुति की। हंस सारग्रही होता है,इसलिए इस वाहन पर दर्शन करने से शुद्ध सात्विक सारग्रहि बुद्धि प्राप्त होती है।
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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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