हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। ब्रज में अपने अंदाज में श्राद्ध पक्ष में भी 16 दिन लगातार सांझी महोत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस बार भी पूरे श्राद्ध पक्ष में ब्रज के मंदिरों में सांझी महोत्सव की धूम रहेगी। ब्रजभूमि पर्व-उत्सवों के लिए विख्यात है। यहां के मंदिर- देवालयों में मनाए जाने वाले उत्सवों के कारण एक प्राचीन कहावत आठ वार-नौ त्योहार प्रचलित है। कहा जाता है शुभ कार्य श्राद्ध पक्ष के समय नहीं होते लेकिन ब्रज में अपने अंदाज में श्राद्ध पक्ष में भी 16 दिन लगातार सांझी महोत्सव हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस बार भी पूरे श्राद्ध पक्ष (29 सितंबर से 14 अक्तूबर तक) में ब्रज के मंदिरों में सांझी महोत्सव की धूम रहेगी। जहां मंदिरों में रंग व फूलों की सांझी बनाई जाएगी, वहीं आसपास के ग्रामीण अंचलों में गोबर से सांझी बनाकर महोत्सव मनाया जाएगा।
राधा कृष्ण के संध्या मिलन का उत्सव है सांझी
सांझी अर्थात सायं (सांझ) ब्रज की अधिष्ठात्री राधा रानी और भगवान कृष्ण का सायं को मिलन लीला को प्रदर्शित करने का स्वरूप है। राधाबल्लभ मंदिर के सेवायत मोहित मराल गोस्वामी ने बताया कि सांझी की शुरुआत स्वयं राधा रानी द्वारा की गई थी। सर्वप्रथम भगवान कृष्ण के साथ वनों में उन्होंने ही अपनी सहचरियों के साथ सांझी बनाई। वन में आराध्य देव कृष्ण के साथ सांझी बनाना राधा रानी को सर्वप्रिय था। तभी से यह परंपरा ब्रजवासियों ने अपना ली और राधाकृष्ण को रिझाने के लिए अपने घरों के आंगन में सांझी बनाने लगे। उन्होंने बताया कि हिन्दी माह क्वार की एकादशी से प्रतिप्रदा तिथि तक 16 दिन सांझी महोत्सव के तौर पर मंदिर में राधा रानी का आह्वान किया जाता है। इसमें मंदिर के चौक में सूखे रंगों, पुष्पों से सांझी बना कर मंदिर में विराजमान ठाकुरजी के श्रीविग्रह के समक्ष उसकी पूजा, भोग राग और गोस्वामियों द्वारा सामूहिक समाज गायन किया जाता है। मंदिर में श्राद्ध पक्ष में फूलों की सांझी, रंगों की सांझी, गाय के गोबर की सांझी ,पानी पर तैरती सांझी आदि प्रतिदिन बनाई जाएगी। इन सांझियो में भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलाओं का मनमोहक दर्शन भक्तों को मिलता है।
वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक सतीशचंद्र दीक्षित ने बताया कि सांझी ब्रज की पारंपरिक कला है। ब्रजक्षेत्र से जुड़ी पांडुलिपियों में सांझी के अंदर 16 दिन तक विभिन्न आकृतियां गोबर से बनाई जाती हैं। सांझी कलाकार रसिक वल्लभ नागार्च ने बताया कि सांझी को बनाने में तकरीबन दस से बारह घंटे का समय लगता है। बनाई गई सांझी की पूजा शाम को होती है और मंदिरों के पट बंद होने के बाद सांझी का विसर्जन कर दिया जाता है। प्रतिदिन नई सांझी ही बनाई जाती है।
महाराजा नागरीदास ने दिया था महत्वपूर्ण योगदान
ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी ने बताया कि ब्रज मंडल में सांझी कला को सहेजने में सत्रहवीं सदी में राजस्थान के कृष्णगढ़ के महाराजा सावंत दास उर्फ नागरीदास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राजा सावंत सिंह ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि भी थे और चित्रकला के उन्नायक भी। इन्हीं के दरबार में प्रसिद्ध कृष्णगढ़ लघुचित्र शैली विकसित हुई। राजा सावंत सिंह सन 1762 ई. में अपनी दूसरे नंबर की पत्नी बनी-ठनी के साथ वृंदावन आ गए और फिर कभी कृष्णगढ़ लौटकर नहीं गए। उन्होंने कहा कि कलाप्रेमी महाराजा ने अपने समय में देवालयों से बाहर व वृंदावन के खुले मैदानों में भव्य सांझी मेले आयोजित कराए और रास मंच के लिए सांझी लीला लिखीं और उनका मंचन भी कराया। दरबारी चित्रकारों ने भी नागरीदास के काव्य पर आधारित कृष्णगढ़ शैली में सांझी विषयक चित्र बनाए। उन्होंने बताया कि संस्थान में संग्रहीत अभिलेखों, पांडुलिपियों व वृंदावनी इतिहास के ग्रंथों में इन सांझी मेलों का तत्कालीन सजीव विवरण मिलता है। परंतु समय ने राजा सावंर्त सिंह नागरीदास को भुला दिया और वह सांझी मेले भी उन्नीसवीं सदी के मध्य में बंद हो गए।
