हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ़ विजय सिंघल
मथुरा। नौहझील में रसोई गैस की किल्लत के बीच कोयले के बढ़ते चलन से इसकी खपत बढ़ गई है। इसका सीधा असर ईंट भट्ठा व्यवसाय पर पड़ा है। सीजन शुरू होते ही हाइड्रा तकनीक से पकाई जाने वाली ईंटों की लागत बढ़ गई है। इससे आने वाले समय में ईंटों के दाम बढ़ेंगे और घर बनाना महंगा हो जाएगा। सरकार द्वारा औद्योगिक उपयोग के एलपीजी सिलेंडरों पर लगाई गई हालिया रोक के बाद कोयले के बाजार में ऐसा भूचाल आया है कि ईंट भट्ठा उद्योग झुलस गया है। जिले के लगभग 325 और नौहझील क्षेत्र के 135 भट्ठों पर इस वक्त अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। प्रदूषण की विकराल समस्या से निपटने के लिए प्रशासन ने पहले ईंट भट्ठों पर कड़ा रुख अपनाया था, जिसके बाद संचालकों ने भारी निवेश कर हाइड्रा जैसी आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल तकनीक को अपनाया। सरकार ने मार्च से जून तक के पीक सीजन में इसी तकनीक से ईंट पकाने की अनुमति दी है। विडंबना देखिए कि जिस तकनीक को पर्यावरण बचाने का हथियार माना गया, वह अब महंगे कोयले के कारण भट्टा स्वामियों के लिए गले की फांस बन गई है। औद्योगिक क्षेत्रों में गैस की कमी होते ही बड़ी कंपनियों ने कोयले का रुख किया, जिससे बाजार में कोयले की मांग अचानक बढ़ गई और इसके दाम रॉकेट की तरह ऊपर जा रहे हैं। बाजार के आंकड़े किसी को भी चौंका सकते हैं। कुछ समय पहले तक जो कोयला 9 से 10 रुपये प्रति किलो के भाव पर आसानी से उपलब्ध था, आज उसके दाम 16 से 17 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। हैरानी की बात यह है कि दोगुने दाम देने के बावजूद भट्ठा संचालकों को पर्याप्त मात्रा में कोयला नहीं मिल रहा है।
7455095736
Author: Vijay Singhal
50% LikesVS
50% Dislikes
