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कीचड़ और मिट्टी की होली… वर्षों से चली आ रही होली की अनोखी परंपरा

ByVijay Singhal

Mar 20, 2024
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हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। सुरीर में ब्रज की रज चंदन बने, माटी बने अबीर। कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।। कृष्ण भक्ति का यह दोहा नौहझील और सुरीर में खेले जाने वाली कीचड़ व मिट्टी की होली पर जीवंत दिखाई देता है। वैसे भी ब्रज धाम सांवरिया का है। यहां भक्ति के रंग में रंगे भक्त भाव से पूजा करते हैं। तीनों लोक के स्वामी को अपना लल्ला मानते हैं। जब बात भक्ति और भगवान के भाव से ऊपर उठकर निश्छल प्रेम की हो, तो जो भी किया जाए वो एक परंपरा बन जाती है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण को होली का त्योहार सबसे अधिक प्रिय है। अब कृष्ण के प्रिय त्योहार की बात हो तो उनकी नगरी होली के त्योहार को कैसे विशेष न बना दे। तभी तो सारी दुनिया ब्रज की होली की दीवानी है। पूरे बृज में होली खेलने के अलग-अलग अंदाज और रिवाज है। रंग-गुलाल और लठामार होली के अलावा ब्रज में कई जगह कीचड़ और मिट्टी की भी होली खेली जाती है। सुरीर और नौहझील समेत कई गांव हैं, जहां कीचड़ और मिट्टी की होली खेलने की रिवाज वर्षों से चली आ रही है। यहां रंग की होली (धुलेड़ी) के अगले दिन मिट्टी व कीचड़ की होली खेली जाती है। होली के हुरियारे जगह-जगह मिट्टी लाकर डाल देते हैं, जिसका घोल बनाने के बाद हुरियारे युवक एक दूसरी को मिट्टी में सराबोर करने के बाद राहगीरों समेत लोगों को खींच कर मिट्टी में सराबोर करते घूमते हैं। जिसकी वजह से बाजार बंद हो जाता है। लोग अपने घरों की छत पर चढ़कर इस होली का आनंद लेते हैं। सुरीर निवासी अनिल कुमार का कहना है कि मिट्टी से होली खेलने का ब्रज में एक अलग अंदाज है। नौहझील निवासी मनीष जिंदल का कहना है कि इसमें ब्रज रज के रूप में मिट्टी और कीचड़ की होली खेलने का भाव है।
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Vijay Singhal
Author: Vijay Singhal

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