हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ) ने बच्चों के शारीरिक और मानसिक दबाव को कम करने का सुझाव दिया था। धरातल पर ऐसा नहीं दिख रहा है। नन्हे कंधों पर पाठ्य सामग्री का बोझ इतना है कि वह सह नहीं पा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि कुछ स्कूलों ने दिखावे के लिए एनसीईआरटी की एक-दो पुस्तकें लगाई हैं। बाकी निजी पब्लिशर्स की किताबें महंगे दामों पर बिकवा रहे हैं। इससे अभिभावकों को महंगाई और बच्चों को बैग का वजन परेशान कर रहा है। बैग के भार को लेकर न कोई नियम है न कानून। निजी स्कूलों के अपने-अपने नियम हैं। अपनी शर्तें हैं। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल बैग कंधे से बार-बार नीचे तक आ जाते हैं। कई अभिभावक तो बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने के लिए उनके बैग को खुद ही टांग लेते हैं। इस तरह की तस्वीरें हर रोज शहर के सभी काॅन्वेंट स्कूलों के बाहर नजर आ जाएंगी, लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी इस ओर से अनजान हैं। छात्र अभिभावक कल्याण संघ के संस्थापक शशि भानु गर्ग ने बताया कि एनसीएफ के अनुसार कक्षा एक और दो में बच्चों को भाषा और गणित केवल दो ही विषय पढ़ाना पर्याप्त है। जबकि निजी स्कूलों में कक्षा एक से ही कंप्यूटर साइंस, सोशल साइंस समेत अन्य विषय भी पढ़ाते हैं। अभिभावक मृदुल अग्रवाल के अनुसार कक्षा दो तक के बच्चों को होमवर्क देना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कॉपी ही कक्षा कार्य के लिए काफी है। कक्षा तीन से पांच तक के लिए एक बार में केवल दो कॉपियों की अनुमति है। रविंद्र सिंह, डीआईओएस ने कहा, छोटे बच्चों के बैग में जरूरत के हिसाब से ही किताबें होनी चाहिए। छह-सात किताबें और फिर कॉॅपियां बैग में होंगी तो लाजिमी है कि बैग का वजन बढ़ेगा। इस मामले की जांच कराई जाएगी।
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Author: Vijay Singhal
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