हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। ब्रजभूमि में मौजूद ब्रज संस्कृति एवं ब्रज की लोक कलाओं को उकेरने के लिए मथुरा में निजी क्षेत्र में ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय बनाया गया है जो यहां आनेवाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को यहां की उन कलाओं के बारे में जानकारी देगा जो समय के साथ विलुप्त होती जा रही हैं। वैसे तो मथुरा में विश्वस्तरीय दो अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय पहले से ही मौजूद हैं जो जैन धर्म और बौद्ध धर्म पर आधारित हैं तथा इन दोनेा धर्मों की विस्तृत जानकारी देते है और ये ब्रज की पुरातात्विक परंपरा की धरोहर हैं। इन संग्रहालयों में इतनी दुर्लभ कलाकृतियां हैं कि विदेशी छा़त्र अपने शोध के अंतर्गत यहां आते रहते हैं किंतु इन दोनो ही संग्रहालयों में ब्रज की उन कलाकृतियों का एक प्रकार से अभाव है जो ब्रज की थाती हैं। ब्रज लोक कला एवं शिल्प संग्रहालय ब्रज की उस संस्कृति को उकेरने का काम करेगा जो अपने आप में निराली ही नही बल्कि शिक्षाप्रद भी हैं।किस वाद्य यंत्र को कब बजाया जाएगा और उस समय बजाने का इसका किंतना महत्व है यह इस संग्रहालय में देखने को मिलता है।उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के उपाध्यक्ष शैलजाकांत मिश्र का मानना है कि ब्रज के तीर्थत्व की वापसी के आंदोलन की जीवंत प्रस्तुति इस संग्रहालय में बहुत सुन्दर तरीके से प्रस्तुत की गई है। उनका कहना था कि व्रज की कलाओं के माध्यम से यहां की संस्कृति का अध्ययन करनेवाले शोधार्थियों के लिए संग्रहालय जीवनी का काम करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह संग्रहालय यहां आनेवाले तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को यहां की प्राचीन लोक कला एवं शिल्प कला की जानकारी देगा तथा राधा और कृष्ण की उन लीलाओं का भी प्रस्तुतीकरण करेगा जो अभी तक अछूते हैं। ब्रज संस्कृति के महान विद्वान एवं ब्रज की आध्यात्मिक जगत की हस्ती श्रीवत्स गोस्वामी ने कहा कि श्रीकृष्णा के प्रपौत्र वज्रनाभ ने महाभारत के बाद सम्पूर्ण ब्रज को ही श्रीकृष्ण की लीलाओं का संग्रहालय बना दिया था। उनका कहना था कि यदि एफ एस ग्राउज ने मथुरा संग्रहालय बनाया था तो उससे पहले ही श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने चैरासी कोस परिक्रमा को ही संग्रहालय का ऐसा स्वरूप प्र्रदान किया कि यह परिक्रमा जहां धार्मिकता में रंगे लोगों को आध्यात्मिक भोजन देती है वहीं शोधकर्ताओं को शोध करने की नई दिशा देती हैै। उसी दिशा में स्थापित यह संग्रहालय ब्रज की उस सांस्कृतिक धरोहर को संजोने और संवारने का काम करेगा जिस पर आधुनिकता का संकट मड़रा रहा है।गीता आश्रम वृन्दावन के संरक्षक डा0 अवशेषानन्द का कहना है कि स्कूलों के प्रधानाचार्यों को अपने यहां के बच्चों को यह संग्रहालय अवश्य दिखाना चाहिए क्योंकि उन्हें ब्रज संस्कृति की जानकारी देना आवश्यक है।अगर सरकार इस संग्रहालय का व्यापक प्रचार किया गया तो यह पर्यटकों के लिए चुम्बक का काम कर सकता है।बइस संग्रहालय को मूर्त रूप देनेवाले डा उमेश चन्द्र शर्मा ने बताया कि इस संग्रहालय का विचार उनके मन में अनायास ही आया और जब उन्होंने इसकी चर्चा अपने बेटे स्व0 विभु शर्मा से की जो कि नेशनल म्यूजियम दिल्ली में किसी समय क्यूरेटर थे तो उन्होंने इसका वर्तमान स्वंरूप देने का कार्य काफी कुछ किया। उन्होंने बताया कि उनके पास विभिन्न कलाओं से संबंधित अभी बहुत कुछ सामग्री है किंतु स्थान के अभाव मेें वे अभी उनका प्रस्तुतीकरण नही कर पा रहे हैं। इस संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर ही नगाड़ा रखा हुआ है जिसे ब्रज में बम्ब कहा जाता है तथा जो होली में वादन का प्रमुख वाद्ययंत्र है। कौन वाद्य यंत्र कब बजाया जाएगा इसकी जानकारी भी यह संग्रहालय दे रहा है। संग्रहालय को लगभग एक दर्जन बीथिकाओं के माध्यम से उकेरा गया है। संग्रहालय में दो लकड़ी की कृष्ण की अति प्राचीन दुर्लभ मूर्तियां है जिनमें एक में कृष्ण के सिर पर नाग है वहीं दूसरे नाग के फन पर वे खड़े हैं तथा नाग कमल के फूल पर बैठा है तो दूसरी कृष्ण की मूर्ति में वे डेढ दो साल के वस़्त्रविहीन बालक हैं। देानेा ही कलाकृतियां अति प्राचीन हैं। संग्रहालय में मंदिरों की निराली सांझी परंपरा को उसकी विविधिताओं के साथ दिखाया गया है। पहले चलने वाले गिलट के और तुलसी के आभूषण , मंदिर की पिछवाई व मुकुुट, प्राचीन पर्स यानी बटुआ, ग्रामीण प्राचीन बर्तन ,झोपड़ी और खटिया यानी खाट को भी संगहालय का प्रमुख अंग बनाया गया है। पूर्वजों ने किस प्रकार का जीवन बिताया तथा उन्होंने कितनी कठिन साधना की इसका जीवन्त उदाहरण जांत या घर में ही आटा पीसने का तरीका , दरांती यानी दाल को बनाने का पुराना तरीका, साधारण एवं अंग्रेजी हल आदि हैं । कुल मिलाकर यह संग्रहालय एक प्रकार से ब्रज की संस्कृति और कलाओं का दर्पण बन सकता है।
