होली खेलने के लिए हुरियारिन भी तैयार हैं। 1 महीने पहले से वो अपनी लाठियों को तेल लगा रही हैं, तो होली के परंपरागत गीत गाने का भी अभ्यास करती हैं। इसके अलावा वह होली खेलने के लिए नए कपड़े भी सिलवाती हैं। इस दिन वह खास लहंगा-फरिया पहनती हैं।
हाथों में न लगे चोट इसके लिए लाठियों में लगाते हैं तेल
होली की तैयारियों में जुटी हुरियारिन बरसाना में ढोल की धुन पर नाचने और परंपरागत गीत गाने का अभ्यास कर रही हैं। होली की तैयारी में जुटी हुरियारिन राधिका ने बताया कि वह एक महीने पहले से तैयारी करते हैं। इसके लिए लाठियों में तेल लगाकर चिकना करते हैं जिससे हाथों में चोट न लगे और लाठी ढाल पर ही पड़े। इसके अलावा होली खेलने के लिए घी खाते हैं,मेवा खाते हैं और दूध पीते हैं। नंदगांव बरसाना में टेलर मनोज शर्मा सिर्फ बगल बंदी सिलने का काम करते हैं। मनोज बताते हैं कि उनके पास हर साल बसंत पंचमी से ही बगल बंदी सिलने का ऑर्डर आता है। वह दिन रात मेहनत कर लट्ठमार होली से एक दिन पहले बगल बंदी बनाकर हुरियारों को दे देते हैं। मनोज ने बताया होली पर सबसे ज्यादा पीली और सफेद बगल बंदी की डिमांड होती है। एक बगल बंदी में 3.5 मीटर कपड़ा लगता है। एक बगल बंदी को तैयार करने में 2 से 3 घंटे लगते हैं। इस बार मनोज पर करीब 300 बगल बंदी बनाने का ऑर्डर है।
1 लहंगा फरिया की कीमत है 5 हजार
होली के लिए हुरियारिन खास ड्रेस लंहगा फरिया पहनती हैं। लहंगा फरिया बेचने वाले व्यापारी संजू अग्रवाल ने बताया की बरसाना में हुरियारिन नए लहंगा फरिया पहनकर ही होली खेलती हैं। उनके यहां कम से कम लंहगा फरिया की कीमत 5 हजार रुपए है। संजू अग्रवाल के पास 31 हुरियारिन के कपड़े तैयार करने का ऑर्डर है।
पारंपरिक भेष भूषा है बगल बंदी
बरसाना स्थित राधा रानी मंदिर के पुजारी किशोरी श्याम गोस्वामी ने बताया कि बगल बंदी पारंपरिक भेष भूषा है। ब्रज में भगवान कृष्ण ने भी जामा और बगल बंदी पहनी थी। इसलिए बगल बंदी पारंपरिक भेष भूषा है। बगल बंदी पहनने में भी आसान है। इसीलिए होली खेलने के लिए नई बगल बंदी बनवाई जाती है
