हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिघल
मथुरा। वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर के आसपास ऐसी 22 कुंज गलियां हैं। इन गलियों में करीब 350 घर हैं, उनमें 2000 से 2200 लोग रहते हैं। अब इन बृजवासियों के घरों के गेट पर अलग-अलग नंबर लिख दिए गए हैं। इसे लिखने वाले मथुरा नगर निगम के कर्मचारी हैं। लेकिन इसके बारे में यहां के रहवासी अभी तक बेखबर हैं कि आखिर इसका माजरा क्या है? सबका अंदाजा यही है कि उनका घर बांके बिहारी कॉरिडोर में आ रहा है और उन्हें विस्थापित किया जाएगा। मेरो दर्द यही है कि यहां से न जाएं, तो अच्छा है। कॉरिडोर बननो है, तो जमुना किनारे बनवाओ। यहां हम मर जाएंगे बेटा, हमारो 100 साल पुरानी जगह है। हमारी उमर इतनी आय गयो है। हमारन बालक छोटन-छोटन थे, तभी उनके पिता गुजर गए। हम नहीं चाहें कि ये कॉरिडोर बनय यहां। हम बिहारीजी, यमुना मइया, राधा-वल्लभ के बीच में रहत हैं। हमें कहीं नहीं जाना, हमें तो यहीं मट्टी मिलनी है।” यह दर्द है 70 साल की बुजुर्ग शकुंतला देवी का, जो बांके बिहारी मंदिर से सटी एक कुंज गली में लाठी लेकर बैठी हैं। शकुंतला बांके बिहारी कॉरिडोर के बारे में पूछने पर रुंधे हुए गले से बोलना शुरू करती हैं और आखिर में आंख में आंसू छलक आते हैं। ये तो सिर्फ एक शकुंतला की बात है। कुंज गलियों में हर घर और हर दुकान के सामने आपको काले रंग का पोस्टर टंगा हुआ मिल जाएगा। जिन पर “कॉरिडोर तो बहाना है, कुंज गलियों को मिटाना है..’ जैसे अलग-अलग स्लोगन लिखे हुए हैं। गलियों के नुक्कड़ों और दुकानों पर बैठे स्थानीय रहवासी कॉरिडोर से जुड़ी खबरों पर कहीं मुखर तो कहीं कानाफूसी वाली चर्चा भी करते नजर आते हैं। स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी भी गलियों में घूमते हुए मिल जाएंगे। रोज शाम को 7 बजे के आसपास रहवासी और व्यापारी कॉरिडोर के विरोध में जुलूस निकालते हैं। यह जुलूस अलग-गलियों से निकलकर और एक किमी की दूरी तय करके बांके बिहारी मंदिर के मुख्य गेट पर खत्म होता है। हां, इसकी शक्ल रोज अलग-अलग होती है। कभी लोग मंजीरे और थाली बजाते हैं, कभी कैंडल मार्च निकालते हैं तो कभी मौन जुलूस… लेकिन कॉरिडोर का विरोध हर शाम करते हैं।
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Author: Vijay Singhal
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