मथुरा। वृंदावन में श्रीबांकेबिहारी महाराज के रंगोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं। इस बार भी ठाकुरजी की होली को विशेष भव्यता प्रदान करने के लिए कश्मीरी केसर, कनौजिया इत्र, कर्नाटकी चंदन और हाथरस से अबीर-गुलाल मंगवाया गया है। इसके अलावा काबुली मेवा भी मंगाई गई है, जिसका ठाकुरजी को भोग अर्पित किया जाएगा।
रंगभरनी एकादशी से ठाकुरजी और भक्तों पर बरसाने के लिए टेसू के फूलों से बना प्राकृतिक रंग तैयार किया जा रहा है। मंदिर के परिक्रमा मार्ग स्थित प्राचीन होली कक्ष में इसके लिए विशेष भट्ठी बनाई गई है, जहां बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में टेसू के फूल उबालकर हजारों लीटर रंग तैयार किया जा रहा है। सेवायत आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी ने बताया कि रंगोत्सव 10 से 13 मार्च तक आयोजित होगा और 14 मार्च को डोलोत्सव मनाया जाएगा। इस बार एक तिथि क्षय होने के कारण पांच के बजाय केवल चार दिनों तक ही रंगीली होली का आयोजन हो सकेगा। वर्षभर ठाकुरजी की सेवा में अग्रणी भूमिका निभाने वाला बेरीबाला परिवार रंगोत्सव में भी विशेष सेवा प्रदान करता है। टेसू के फूलों से तैयार होने वाले गुनगुने रंग को बनाने की पूरी जिम्मेदारी इस परिवार के सदस्यों की होती है। मंदिर में तीनों आरतियों के समय बेरीबाला परिवार की हवेली से विशेष अबीर-गुलाल भेजा जाता है। केसर खीर और चोबा टीका भी परिवार के वरिष्ठ सदस्य स्वयं अपने हाथों से तैयार करते हैं। यह परंपरा लगभग 70-80 वर्ष पूर्व लाला हरगुलाल और रामजी लाल बेरीबाला ने शुरू की थी जिसे आज राधेश्याम बेरीबाला बखूबी निभा रहे हैं।
रंगभरनी एकादशी से ठाकुरजी और भक्तों पर बरसाने के लिए टेसू के फूलों से बना प्राकृतिक रंग तैयार किया जा रहा है। मंदिर के परिक्रमा मार्ग स्थित प्राचीन होली कक्ष में इसके लिए विशेष भट्ठी बनाई गई है, जहां बड़ी-बड़ी कढ़ाइयों में टेसू के फूल उबालकर हजारों लीटर रंग तैयार किया जा रहा है। सेवायत आचार्य प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी ने बताया कि रंगोत्सव 10 से 13 मार्च तक आयोजित होगा और 14 मार्च को डोलोत्सव मनाया जाएगा। इस बार एक तिथि क्षय होने के कारण पांच के बजाय केवल चार दिनों तक ही रंगीली होली का आयोजन हो सकेगा। वर्षभर ठाकुरजी की सेवा में अग्रणी भूमिका निभाने वाला बेरीबाला परिवार रंगोत्सव में भी विशेष सेवा प्रदान करता है। टेसू के फूलों से तैयार होने वाले गुनगुने रंग को बनाने की पूरी जिम्मेदारी इस परिवार के सदस्यों की होती है। मंदिर में तीनों आरतियों के समय बेरीबाला परिवार की हवेली से विशेष अबीर-गुलाल भेजा जाता है। केसर खीर और चोबा टीका भी परिवार के वरिष्ठ सदस्य स्वयं अपने हाथों से तैयार करते हैं। यह परंपरा लगभग 70-80 वर्ष पूर्व लाला हरगुलाल और रामजी लाल बेरीबाला ने शुरू की थी जिसे आज राधेश्याम बेरीबाला बखूबी निभा रहे हैं।
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Author: Vijay Singhal
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