मथुरा। सरकार ने 40 साल पहले अनुसूचित जाति के पात्रों को रोजगार के लिए अलग-अलग विकास खंडों में दुकानें बनाकर उनका निशुल्क आवंटन किया था। सरकार की मंशा बेरोजगार हाथों को मजबूत बनाने की थी, लेकिन यहां लाभार्थियों ने रोजगार के बजाए सीधे दुकानों का ही ””””व्यापार”””” कर लिया। कुछ ने दुकानें बेच दीं तो कुछ ने किराए पर उठा दीं। शिकायत के बाद मामला खुला तो डीएम ने जांच के आदेश दे दिए। जल्द ही जांच टीम अब हकीकत की पड़ताल करेगी। वर्ष 1983 से 1985 के बीच उप्र अनुसूचित जाति एवं विकास निगम लिमिटेड मथुरा द्वारा सामूहिक दुकानों का निर्माण कराया गया था। विकास खंड मथुरा, फरह, बलदेव, मांट और नंदगांव में कुल 201 दुकानों का निर्माण कर अनुसूचित जाति के पात्रों को इनका आवंटन किया गया था। निशुल्क रूप से आवंटित इन दुकानों में लाभार्थियों को अपना रोजगार खोलना था। विभाग इन दुकानों का आवंटन कर निगरानी करना भूल गया। चार दशक बाद एक शिकायत पर विभाग की नींद टूटी तो अलग ही कहानी सामने आई। कई आवंटियों ने दुकानों में रोजगार शुरू करने के बजाए उन्हें बेचकर एक बार में ही अपनी जेब भर ली। वहीं कुछ ने दुकानों को किराये पर दे दिया। आवंटन की शर्तों के अनुसार ये नियम विरुद्ध है। मामला जिलाधिकारी तक पहुंचा तो उन्होंने जिले भर में आवंटित दुकानों की जांच के लिए कमेटी बना दी है। कमेटी जल्द ही अब जांच कर कार्रवाई शुरू करेगी।
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Author: Vijay Singhal
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