हिदुस्तान 24 टीवी न्यूज चीफ विजय सिंघल
मथुरा। रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से खेती योग्य मृदा की सेहत बिगड़ रही है। जीवांश कार्बन निरंतर घट रहे हैं। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की कमी आ रही है। इसका सीधा असर फसलों की पैदावार पर पड़ रहा है। जनपद में प्रति वर्ष मृदा के करीब 7000 परीक्षण किए जा रहे हैं। इनमें से एक हजार नमूनों की जांच कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से हो रही है, जबकि करीब 6 हजार मृदा परीक्षण कृषि विभाग द्वारा किए जा रहे हैं। मृदा परीक्षण की रिपोर्ट चिंताजनक है, जो खेतों की मिट्टी के बीमार होने के स्पष्ट संकेत दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर नमूनों में जीवांश कार्बन निर्धारित मानक से कम पाए जा रहे हैं। 90 प्रतिशत नमूनों में जीवांश कार्बन की संख्या 0.2 से 04 तक मिल रही है, जो तय मानक से 50 प्रतिशत कम हैं। यह दर्शाता है कि जमीन में पोषक तत्वों की कमी हो रही है। इसका असर फसलों की पैदावार पर पड़ रहा है। मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा भी कम हो रही है। 85 प्रतिशत नमूने दर्शाते हैं कि 280-560 के सापेक्ष नाइट्रोजन की मात्रा 200-250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिल रही है। फास्फोरस और पोटाश की मात्रा भी कम हो रही है। दोनों की उपलब्धता मध्यम है। माइक्रो न्यूटेंट भी चिंताजनक स्थिति में हैं। मृदा परीक्षण से सामने आ रही यह स्थिति फसल उत्पादन की दृष्टि से चिंताजनक है।
फसलों में 8 गुना तक रासायनिक उपयोग
जमीन में कार्बनिक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए किसान अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं। राया, बलदेव, महावन क्षेत्र में यह समस्या गंभीर है। आलू की फसल में किसान आवश्यकता से कई गुना अधिक रासायनिक खादों का उपयोग कर रहे हैं। छाता, गोवर्धन, बरसाना, नौहझील, मांट में धान की खेती में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। यहां किसान 2 से 8 गुना तक रासायनिक उर्वरकों उपयोग कर रहे हैं। यमुना किनारे के गांवों में सब्जी उगाने वाले किसान भी भी इसी श्रेणी में शामिल है। इसमें महावन, बलदेव, सदर, चौमुहां, गोवर्धन और मांट क्षेत्र शामिल हैं। मृदा परीक्षण वैज्ञानिक डॉ. रविंद्र कुमार राजपूत का कहना है कि अत्यधिक रासायनों के उपयोग से जल, वायु और जमीन खराब हो रही है। किसान आवश्यकता से दो से आठ गुना तक रासायनिक उपयोग फसलों में कर रहा है। इससे बचने की जरूरत है। जैविक खाद को बढ़ावा देने की जरूरत कृषि वैज्ञानिक डॉ नंदराम राजपूत ने बताया कि जमीन में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए जैविक खाद का सहारा लेने की जरूरत है। रासायनिक खाद के बजाए गोबर की खाद, हरी खाद और वर्मी कंपोस्ट का सहारा लिया जा सकता है। ये खाद जमीन में जीवांश की आवश्यकता पूरा करेगी और फसल की उत्पादकता को भी बढ़ाएगा। किसान तीन साल में एक बार जैविक खाद का उपयोग करते हुए रसायनों का इस्तेमाल घटा सकता है।
जमीन में कार्बनिक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए किसान अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं। राया, बलदेव, महावन क्षेत्र में यह समस्या गंभीर है। आलू की फसल में किसान आवश्यकता से कई गुना अधिक रासायनिक खादों का उपयोग कर रहे हैं। छाता, गोवर्धन, बरसाना, नौहझील, मांट में धान की खेती में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। यहां किसान 2 से 8 गुना तक रासायनिक उर्वरकों उपयोग कर रहे हैं। यमुना किनारे के गांवों में सब्जी उगाने वाले किसान भी भी इसी श्रेणी में शामिल है। इसमें महावन, बलदेव, सदर, चौमुहां, गोवर्धन और मांट क्षेत्र शामिल हैं। मृदा परीक्षण वैज्ञानिक डॉ. रविंद्र कुमार राजपूत का कहना है कि अत्यधिक रासायनों के उपयोग से जल, वायु और जमीन खराब हो रही है। किसान आवश्यकता से दो से आठ गुना तक रासायनिक उपयोग फसलों में कर रहा है। इससे बचने की जरूरत है। जैविक खाद को बढ़ावा देने की जरूरत कृषि वैज्ञानिक डॉ नंदराम राजपूत ने बताया कि जमीन में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए जैविक खाद का सहारा लेने की जरूरत है। रासायनिक खाद के बजाए गोबर की खाद, हरी खाद और वर्मी कंपोस्ट का सहारा लिया जा सकता है। ये खाद जमीन में जीवांश की आवश्यकता पूरा करेगी और फसल की उत्पादकता को भी बढ़ाएगा। किसान तीन साल में एक बार जैविक खाद का उपयोग करते हुए रसायनों का इस्तेमाल घटा सकता है।
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Author: Vijay Singhal
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